पहले मुझे लगा ख़बर ग़लत है: फ़ारूकी

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी
Image caption 'सितारा-ए-इम्तियाज़' पाकिस्तान का तीसरा बड़ा पुरस्कार माना जाता है.

पाकिस्तान ने इस साल 14 ِअगस्त को अपने स्वतंत्रता दिवस पर भारत के उर्दू के मशहूर साहित्यकार, आलोचक और उपन्यासकार शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी को 'सितारा-ए-इम्तियाज़' सम्मान देने की घोषणा की.

यह पाकिस्तान का तीसरा बड़ा नागरिक सम्मान माना जाता है. यह पुरस्कार उन्हें 23 मार्च को मनाए जाने वाले 'पाकिस्तान दिवस' के अवसर पर दिया जाएगा.

शम्सुर्रहमान ने इसका श्रेय भारत और पाकिस्तान के साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों को दिया और कहा कि 'सितारा-ए-इम्तियाज़' मिलना उनके लिए सम्मान की बात है.

सबसे पहले तो यह बताएँ कि जब आपको जब पाकिस्तान का 'सितारा-ए-इम्तियाज'पुरस्कार मिलने की ख़बर मिली तो आपका पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

जब मुझे इसकी जानकारी मिली तो लगा कि यह ख़बर ग़लत है. क्योंकि इससे पहले किसी हिंदुस्तानी लेखक को यह पुरस्कार नहीं मिला है. लेकिन मुझे इसकी जानकारी पाकिस्तान के सेंट्रल लैंग्वेज अथॉरिटी के चेयरमैन ने दी थी. इसलिए मेरे पास यक़ीन न करने का कोई कारण नहीं था. इसलिए जब मुझे इसकी सूचना मिली मुझे ताज्जुब के साथ ख़ुशी हुई.

मुझे लगा कि यह पकिस्तान के लेखकों और वहाँ की हुकूमत का दोस्ती की दिशा में उठाया गया एक छोटा सा क़दम है. उन्होंने यह कदम ऐसे समय उठाया है जब लोगों के दिलों में बहुत सा शक और शुबहा है, मैं समझता हूँ कि यह एक अच्छा क़दम है.

आज जब यह धारणा आम है कि पुरस्कार बिकाऊ हो गए हैं. ऐसे में इस पुरस्कार को आप किस तरह से देखते हैं?

हर पुरस्कार का अपना एक स्तर होता है. मैं हिंदुस्तान के पुरस्कारों के बारे में जानता हूँ जो बिकाऊ नहीं है. बहुत से पुरस्कार ऐसे हैं जिनकी बहुत इज़्ज़त है लेकिन बहुत से ऐसे भी हैं जिनमें अब हेर-फेर होने लगी है. पकिस्तान में 'हिलाले इम्तियाज़' को सबसे बड़ा पुरस्कार माना जाता है. उसके बाद नंबर आता है ‘सितारा-ए-इम्तियाज़’ का जो कि मुझे दिया गया है. इनके अलावा भी पाकिस्तान के कुछ पुरस्कार हैं जिसे ठीक-ठाक माना जाता है.

फ़ारूकी साहब अपने बचपन के बारे में बताइए. लिखना कब शुरू किया?

जब मैं सात-आठ साल का था तो मुझे लगता था कि मुझे कुछ लिखना चाहिए.कुछ कहना चाहिए. पंद्रह साल की उम्र में मैंने एक उपन्यास लिखा था, जो चार-पाँच क़िस्तों में छ्पा था. इसके बाद मुझे अपनी पहचान बनाने में काफी समय लगा. मैं यह समझता हूँ कि वे मेरे संघर्ष के दिन थे.मेरा संघर्ष क़रीब 15 साल तक चला. ये मेरे लिए काफी कीमती साल थे. शुरू से ही मैंने कविता, आलोचना, कहानी आदि में प्रयोग करना शुरू कर दिया था. शायद यही कारण है कि लोगों ने बहुत देर से मुझे पहचाना. मैंने ख़ुद को जांचा की मेरे अंदर की कमियाँ क्या हैं.

आपकी पढ़ाई-लिखाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई लेकिन उसके बाद आपने काम करना कहाँ से शुरू किया?

पहले तो मैंने काफी कोशिश कि की मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही काम मिल जाए. क्योंकि मैं अपने क्लास का टॉपर था. लोग समझते थे कि लड़का बड़ा तेज़ है. लेकिन यह इत्तेफ़ाक है कि तीन साल मैंने बलिया के एक कॉलेज में पढ़ाया. वहाँ से निकलने के बाद एक-दो साल मैंने सिबली कॉलेज में भी पढ़ाया.

इस दौरान मेरे लिखने का काम बहुत कम हो गया था. उसके बाद मुझे पोस्ट ऑफ़िस में नौकरी मिल गई. यह बड़ी आरामदायक नौकरी थी. इसमें न मुझे गाली खानी है और न गाली देनी है. मुझे नेताओं के साथ सांठ-गांठ भी नहीं करना था.

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हासिल न जिससे कुछ हो ऐसा सफ़र न देखा,हो आफ़ियत से खाली ऐसा भी घर न देखा आवाज उनकी सुनना,था शहर फूल चुनना,एक ख़्वाब ऐसा देखा फिर उम्र भर न देखा अब रेत हो चली है पिछले बरस की बारिश,बादल ने राह बदली फिर घूम कर न देखा, सब किश्तियाँ जला दीं सब नहरे खुश्क कर दीं,दरिया है दिल न किश्ती अय बेख़बर न देखा.

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