गुलाबी रंग दीना लहरिया...

लहरिया

भारत के रेगिस्तानी राज्य राजस्थान में प्रकृति जब बरसात से धरती का श्रृंगार करती है तो सावन, उत्सव मेलों की सौग़ात लेकर आता है.

सावन में महिलाओं के लिए लहरिया का परिधान बहुत अहम हो जाता है. ये ऐसा परिधान है जो चुपके से हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों को गहरा करता है.

लहरिया मुस्लिम रंगरेज़ तैयार करते हैं, इसे धारण हिन्दू महिलाएं करती हैं.

लहरिया राजस्थानी ओढ़नी या दुपट्टा है और मीरा ने भी अपने पदों में लहरिया का ज़िक्र किया है.

हरियाली की चादर ओढ़े धरती, भीगा हुआ सावन, और लहरिया! रेगिस्तान में ये ऐसा दिलकश नज़ारा पेश करते है गोया क़ुदरत ने ख़ुद कोई रूमानी तस्वीर बनाई हो.

ऊपर आसमान में इन्द्रधनुष इकलौता, मगर नीचे धरती पर जैसे हर लहरिया अपने आप में कोई इन्द्रधनुष हो.

जवाहर कला केंद्र की चंद्रमणि सिंह कहती हैं मरूस्थल में मानसून, सावन और लहरिया का बहुत महत्व है.

वे इतिहास के हवाले से कहती है, "यूँ तो लहरिया का उल्लेख 15वीं सदी में भी मिलता है. सोलहवीं सदी में अवधि के कवि जायसी ने अपने काव्य में लहरिया को जगह दी है. जयपुर में अठारवीं सदी में लहरिया के प्रचलन का सबूत मिलता है."

च्न्द्रमणि सिंह कहती हैं, "धीरे धीर ये शगुन का हिस्सा बन गया. सावन में हर महिला की ख़्वाहिश होती है कि तीज के दौरान उसे उसके पति, पिता या भाई उसे लहरिया भेंट करे. लहरिया पर बहुत से लोक गीत भी बने है."

तीज के नज़दीक वस्त्र विक्रेताओ की लहरिया से सजी धजी दुकाने ऐसा मोहक चित्र प्रस्तुत करती है जैसे वो कोई व्यापरिक फ़र्म नहीं, कला दीर्घा हो.

ऐसी ही एक दुकान से लहरिया ख़रीद कर निकली प्रवीण शर्मा कहती हैं, "लहरिया राजस्थान में संस्कृति का अटूट हिस्सा है. सावन में विवाहित महिला के लिए लहरिया बहुत महत्व रखता है, ये सौभाग्य और सुकून का प्रतीक है."

रंगरेज़ों की बात

जयपुर में कोई एक हज़ार रंगरेज़ परिवार हैं, जो शाही दौर से लहरिया तैयार करते रहे हैं.

रंगरेज कहते हैं जिसकी चुटकी में दम हो, वही अच्छा लहरिया रंग सकता है.

वैसे तो लहरिया महज़ एक लिबास है. मगर ये हिन्दू-मुस्लिम रिश्तो की गहराई की इबारत भी लिखता है.

Image caption मीरा बाई ने अपने पदों में लहरिया का ज़िक्र किया है

अशफ़ाक़ अहमद एक रंगरेज़ है, उन्हें ये कला विरासत में मिली है.

वे कहते है, "लहरिया हमेशा कच्चे रंग में रंगा जाता है सावन में जब महिला कच्चे रंग के लहरिये को ओढ़ कर जाती है और पानी बरसता है और उसका रंग जिस्म पर लगता है तो उसे शुभ माना जाता है."

बादशाह ख़ान इस काम के माहिर है, "लेकिन अब उम्र ढल चुकी, उनके परिजन कहते है बारिश में कच्चे गुलाबी रंग का लहरिया जब भीगता है और विवाहिता की मांग में रंग उतरता है तो उसे बेहद शुभ माना जाता है."

इस सूबे के पास भारत की महज एक फ़ीसदी जल राशि है, चम्बल को छोड़ कर कोई बारहमासी नदी नहीं है. मगर लोगों ने इस कमी को प्रतीकों से पूरा किया. शायद इसीलिए सुंदर लहरिया बहुत मन भावन है.

रानी लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत गुज़रे दौर को याद कर कहती हैं, "इसमें राजा रंक का सवाल नहीं है. ये परिधान सभी के लिए था. उस दौर में महिलाएं समूह में पानी भरने जाती थीं और बारिश उन्हें भिगा देती तो इससे बहुत आनंद मिलता था."

लोग गीतों में

लोक गीत में कहा गया कि उत्तर दिशा में घनघोर घटा है, पिया जब आप अश्वारोही होकर भीगते आएंगे तो मैं अटूट प्रेम का प्रतीक मानूंगी. लहरिया को लोक गीतों में वो ही स्थान मिला है जो आभूषणों को.

साहित्यकार धर्मेन्द्र कँवर कहती हैं, "हर अंचल का लहरिया अपने रंग और शैली में नायाब है. ये कहना ठीक नहीं है कि लहरिया राजमहलों की देन है. बल्कि ये लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है."

लेकिन कुछ रंगरेज़ कहते हैं कि लहरिया में रानी लहरिया बहुत मशहूर था. जो शाही परिवारों की राजसी महिलाओं के लिए ही था. अब हर कोई रानी रंग का लहरिया धारण कर रहा है.

राजस्थान में पंचरंग लहरिया का भी अपना महत्व रहा है. पांच का अंक शुभ माना जाता है. भारतीय दर्शन इंसान की बनावट पांच तत्वों से मानता है. शायद भक्ति रस में पंचरंग लहरिए का ज़िक्र है.

मीरा का पद "पंच रंग चोला पहिर सखी मैं झुरमुट खेलन जाती" इसकी गवाही देता है.

सावन तो ऋतुओं का यौवन काल है. समय के साथ बहुत कुछ बदला लेकिन सावन के झूलों, कोयल का गान और लहरिया के लिबास को कोई नहीं बदल पाया.

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