रिपोर्टों की अनदेखी करके बनी योजना

मुंबई
Image caption झोपड़पट्टियों में रहने वालों के लिए अभी भी घर एक सपना है

जब भी मुंबई में झोपड़पट्टियों को ध्यान में रखकर बनाई गई स्लम रिहैबिलिटेशन स्कीम (एसआरएस) पर बहस होती है तो दो कमेटी रिपोर्टों की चर्चा होती है.

डी अफ़ज़लपुरकर कमेटी की 1995 में पेश की गई रिपोर्ट के बाद इस योजना की शुरुआत हुई थी. लेकिन छह साल बाद 2001 में एसएस तिनैकर कमेटी की रिपोर्ट ने इसी योजना की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे.

अफ़ज़लपुरकर ने बीबीसी को बताया, "कमेटी के सदस्य मुफ़्त घर देने की बात पर सहमत नहीं थे, क्योंकि ऐसा दुनिया में कहीं नहीं होता, लेकिन वो कुछ नहीं कर सकते थे क्योंकि राजनेताओं ने उन्हें एक दायरे में रहकर रिपोर्ट तैयार करने को कहा था जिसके बाहर वो नहीं जा सकते थे."

उस समय भाजपा-शिवसेना सरकार सत्ता में थी.

उधर मुंबई के पूर्व म्युनिसिपल कमिश्नर एसएस तिनैकर के नेतृत्व में दो सदस्यीय कमेटी वर्ष 2001 में बनी. इसका काम था शिवशाही पुनर्वासन प्रकल्प लिमिटेड नाम की सरकारी कंपनी के कामकाज पर रिपोर्ट तैयार करना.

इस कंपनी के माध्यम से सरकार ने स्वयं 'डेवलेपर' की भूमिका अपनाई. क्योंकि उस समय एसआरए स्कीम में बिल्डरों की दिलचस्पी बहुत कम थी.

राजेनताओं के वादे

इस रिपोर्ट के मुताबिक़ इस स्कीम ने अपने लक्ष्य से बहुत कम मकान बनाए, बिल्डरों को मदद पहुँचाई गई, सरकार ने ज़िम्मेदारियों से मुँह चुराया और मंत्रियों ने सिर्फ़ वायदे किए.

रिपोर्ट के मुताबिक मुफ़्त घर देने का कार्यक्रम राजनीतिक था. एसएस तिनैकर अपनी रिपोर्ट में बिल्डरों को ‘डेवलपर्स’ नाम से संबोधित करने पर भी ताना मारते हैं.

म्हाडा के पूर्व प्रमुख और एसआरए के सदस्य रह चुके चंद्रशेखर प्रभु, तिनैकर को काफ़ी नज़दीक से जानते थे. वो बताते हैं कि इतनी लगन और ईमानदारी से तैयार की गई रिपोर्ट पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया.

Image caption रिपोर्ट के मुताबिक मुफ़्त घर देने का कार्यक्रम राजनीतिक था

एसएस तिनैकर की मृत्यु हो चुकी है.

अफ़ज़लपुरकर कमेटी की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद उन्हें महाराष्ट्र का प्रमुख सचिव बना देने में तिनैकर कमेटी को राजनीति नज़र आई थी, हालांकि अफ़ज़लपुरकर इससे इंकार करते हैं.

एसआरए पर लग रहे अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों पर अफ़ज़लपुरकर कहते हैं, "हमने कहा था कि इस स्कीम को पूरी मुंबई में एक साथ नहीं लागू करना चाहिए और सरकार को उन इलाकों को चुनना चाहिए जो बेहद खराब हालत में हैं".

"लोगों को स्कीम से जोड़ने और बिल्डरों को दूर रखने की ज़रूरत है. बिल्डरों ने एसआरए स्कीम को अपने वश में कर लिया है जो हम नहीं चाहते थे. जिस तरह से स्कीम का कार्यान्वयन हुआ है मैं उसके निराश हूँ. इस स्कीम का लोगों ने अपने मतलब के लिए फ़ायदा उठाया है."

हालांकि बिल्डरों का कहना है कि कुछ लोगों की वजह से सभी को ग़लत ठहराना ठीक नहीं है. बिल्डर एसआरए स्कीम की सफ़लताओं की ओर इशारा करते हैं.

लेकिन अफ़ज़लपुरकर कहते हैं कि उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि स्कीम की लगातार समीक्षा होनी चाहिए, जो कि नहीं हुई.

तिनैकर रिपोर्ट पर अफ़ज़लपुरकर कहते हैं कि उन्होंने रिपोर्ट ठीक से पढ़ी नहीं है लेकिन आलोचना के बजाय ज़रूरी है कि विकल्प प्रस्तुत किए जाएं.

ऐसे भी लोग हैं जिनका मानना है कि तिनैकर रिपोर्ट में इतनी ज़्यादा आलोचना की गई थी कि उससे फ़ायदे के बजाए नुकसान हुआ क्योंकि सरकार ने आसानी से उसे दरकिनार कर दिया और उसे गंभीरता से नहीं लिया.

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