ख़ून बहाया नहीं, चढ़ाया

नक्सली (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption जिस जगह पर हिंसा हुई उसे नक्सलियों का गढ़ माना जाता है

बस्तर के जंगलों के क्षेत्र में सुरक्षाकर्मियों और माओवादियों के बीच युद्ध की लकीरे साफ़ खिंची हुई हैं. आमने-सामने आ जाएँ तो मानो क़यामत आ गई हो.

दुश्मनी का ये आलम है कि नारायणपुर में माओवादियों नें घात लगाकर केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 29 जवानों को न केवल मार दिया था. यही नहीं माओवादियों पर ये आरोप भी लगा था कि इसके बाद कुछ जवानों के गले रेत दिए गए थे.

लेकिन 29 अगस्त को इसी इलाके के बीजापुर में हुई पुलिस-माओवादी मुठभेड़ के बाद एक अलग ही नज़ारा देखने को मिला. गिरफ़्तार किए गए एक बुरी तरह ज़ख़्मी माओवादी को बचाने के लिए ख़ून की ज़रूरत थी और उसे ख़ून देने के लिए कई पुलिसवाले सामने आ गए.

मुठभेड़ में घायल, हालत नाज़ुक

कई जवान इस घायल माओवादी को खून देना चाहता थे. लेकिन डाक्टरों का कहना है कि माओवादी मंगलू मांडवी को अब और खून की ज़रुरत नहीं है. वे ख़तरे से बाहर हैं.

बस्तर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरजीत कुमार नें बीबीसी को बताया, "जब मंगलू को बीजापुर से बस्तर के ज़िला मुख्यालय जगदलपुर लाया गया था तो उसकी हालत बहुत नाज़ुक थी. उसकी दाहिनी बाज़ू में गोली लगी थी. वह मुठभेड़ में घायल हुआ था."

बीजापुर में पर्याप्त चिकित्सा व्यवस्था न होने के कारण उन्हें जगदलपुर लाया गया पर मंगलू मांडवी की हालत बिगड़ती चली गई. ज़ख्म से खून का रिसाव होता रहा. जगदलपुर मेडिकल कालेज के डाक्टरों नें फ़ौरन खून का इंतज़ाम करने को कहा.

'खून सबका लाल होता है'

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरजीत कुमार नें बताया, "मैदान में तो वह हमारा दुश्मन है. पता नहीं कितने पुलिस वालों को मारा होगा पर अब यह बिस्तर पर हमारी मदद के इंतज़ार में बेहोश पड़ा था. उसका ब्लड ग्रुप बी पॉज़िटिव है. मैंने जवानों को बताया कि मंगलू कि जान बचाने के लिए खून की ज़रूरत है. बस फिर क्या था – इस ब्लड ग्रुप वाले कई जवान आगे आ गए और खून देने के लिए लाइन लगा दी..."

बस दो जवानों - हरि सिंह ठाकुर और छगनलाल धारिया - के खून से ही बात बन गई.

हरि सिंह ठाकुर का कहना है, "खून सबका लाल होता है…और ये खून के रिश्ते हैं... खून बहाकर ख़त्म नहीं किए जा सकते. एक बार तो लगा मैं क्या कर रहा हूँ? लेकिन साथ ही एहसास हुआ कि वह भी एक इंसान है जो मेरी तरह ज़िन्दगी और मौत से जूझ रहा है."

चंडीगढ़ के सुरजीत कुमार जो बस्तर के इलाके में नक्सल विरोधी अभियान चला रहे हैं, कहते हैं, "गोरना के जंगलों में चली मुठभेड़ के बाद ज़ख़्मी मंगलू को उसका एक माओवादी साथी अपने कंधे पर उठाकर भाग रहा था. वह सुरक्षा बलों से बचता हुआ ज़ख़्मी मंगलू को लेकर एक गड्ढे में छिप गया. लेकिन सुरक्षा बलों नें ये देख लिया था. शायद मंगलू कि जान को बचना ही था, नहीं तो और गोलीबारी और ज़्यादा खून बह जाने से उसकी जान जा सकती थी."

पुलिस का का कहना है कि पिछले आठ सालों से मंगलू भारत की सीपीआई (माओवादी) के लिए काम कर रहा था. वह संगठन के "बसंती" और "गोपी" दलम के लिए काम कर रहा था.

मंगलू को बेहतर इलाज के लिए कड़ी सुरक्षा के बीच रायपुर के अस्पताल में रखा गया है और अब वह ख़तरे से बाहर है. लेकिन जगदलपुर में तैनात अर्धसैनिक बलों के जवानों का कहना है कि अगर मंगलू के लिए फिर से खून कि ज़रुरत पड़े तो वह अपना खून देने को तैयार हैं. मंगलू को किसी से मिलने की इजाज़त नहीं है. मंगलू एक स्थानीय आदिवासी युवक हैं जो हिंदी नहीं जानते, गोंडी में बोलते हैं. एक दुभाषिए ने सुरजीत कुमार को बताया कि होश आने के बाद मंगलू ने जब सुरजीत कुमार के बात करनी चाही थी, तब वे गोंडी में बोले थे – "धन्यवाद."

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