साठ साल से क़ानूनी लड़ाई लड़ते हाशिम अंसारी

सुरक्षा घेरे में हाशिम अंसारी

"मैं फ़ैसले का भी इंतज़ार कर रहा हूँ और मौत का भी....लेकिन यह चाहता हूँ मौत से पहले फ़ैसला देख लूँ." ये शब्द हैं 90 साल के बुज़ुर्ग हाशिम अंसारी के, जो मेरे कानों में बराबर गूंज रहे हैं.

साठ साल से बाबरी मस्जिद की क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे 90 वर्षीय हाशिम गज़ब के जीवट के आदमी हैं. लेकिन उनके चेहरे पर झुर्रियों के साथ-साथ ऐसी मायूसी मैंने बीस वर्षों में पहली बार देखी.

कारण पूछने पर वो कहते हैं, "कुछ मायूसी है हालात को देखते हुए. जो मुखालिफ़ पार्टियां चैलेंज कर रही हैं, उससे मायूसी है और हुकूमत कोई एक्शन नहीं लेती."

क्लिक करें फ़ैसला टालने की अपील पर सुनवाई

हाशिम अयोध्या के उन कुछ चुनिंदा बचे हुए लोगों में से हैं जो लगातार 60 वर्षों से अपने धर्म और बाबरी मस्जिद के लिए संविधान और क़ानून के दायरे में रहते हुए अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं.

'हिंदुओं से भाईचारा, खानपान'

मैं सन 49 से मुक़दमे कि पैरवी कर रहा हूँ, लेकिन आज तक किसी हिंदू ने हमको एक लफ्ज़ ग़लत नहीं कहा. हमारा उनसे भाई चारा है. वो हमको दावत देते हैं. मै उनके यहाँ सपरिवार दावत खाने जाता हूँ.

हाशिम अंसारी

स्थानीय हिंदू साधु-संतों से उनके रिश्ते कभी ख़राब नहीं हुए. मै जब भी उनके घर गया, हमेशा अड़ोस पड़ोस के हिंदू युवक चचा-चचा कहते हुए उनसे बतियाते हुए मिले.

हाशिम कहते हैं, "मैं सन 49 से मुक़दमे कि पैरवी कर रहा हूँ, लेकिन आज तक किसी हिंदू ने हमको एक लफ़्ज़ ग़लत नहीं कहा. हमारा उनसे भाईचारा है. वो हमको दावत देते हैं. मै उनके यहाँ सपरिवार दावत खाने जाता हूँ."

विवादित स्थल के दूसरे प्रमुख दावेदारों में निर्मोही अखाड़ा के राम केवल दास और दिगंबर अखाड़ा के राम चंद्र परमहंस से हाशिम की अंत तक गहरी दोस्ती रही.

क्लिक करें मुख्य दावेदार: महंत भास्कर दास

परमहंस और हाशिम तो अक्सर एक ही रिक्शे या कार में बैठकर मुक़दमे की पैरवी के लिए अदालत जाते थे और साथ ही चाय-नाश्ता करते थे.

उनके ये दोनों दोस्त अब जीवित नहीं रहे. मुक़दमे के एक और वादी भगवान सिंह विशारद भी नहीं रहे.

हाशिम के समकालीन लोगों में निर्मोही अखाड़ा की ओर से मुक़दमे के मुख्य पैरोकार महंत भास्कर दास जीवित हैं.

दंगाइयों का हमला, स्थानीय हिंदुओं ने बचाया

अयोध्या अवध की मिली जुली गंगा जमुनी तहजीब का केंद्र रहा है.

हाशिम अंसारी

हाशिम का परिवार कई पीढ़ियों से अयोध्या में रह रहा है

हाशिम इसी संस्कृति में पले बढे़ जहां मुहर्रम के जुलूस पर हिंदू फूल बरसाते हैं और नवरात्रि के जुलूस पर मुसलमान फूलों की बारिश करते हैं.

हाशिम पिछले साल हज के लिए मक्का गए थे तो कई जगह उन्हें भाषण देने के लिए बुलाया गया. हाशिम ने वहाँ लोगों को बताया कि हिंदुस्तान में मुसलमानों को कितनी आज़ादी है और वे कई मुस्लिम मुल्कों से बेहतर हैं.

हाशिम का परिवार कई पीढ़ियों से अयोध्या में रह रहा है. वो 1921 में पैदा हुए, 11 साल की उम्र में सन् 1932 में उनके पिता का देहांत हो गया.

दर्जा दो तक पढाई की. फिर सिलाई यानी दर्जी का कम करने लगे. यहीं पड़ोस में फैजाबाद में उनकी शादी हुई. उनके बच्चे हैं. एक बेटा और एक बेटी. उनके परिवार की आमदनी का कोई खास ज़रिया नहीं है.

छह दिसंबर, 1992 के बलवे में बाहर से आए दंगाइयों ने उनका घर जला दिया, पर अयोध्या के हिंदुओं ने उन्हें और उनके परिवार को बचाया.

जो कुछ मुआवज़ा मिला उससे हाशिम ने अपने छोटे से घर को दोबारा बनवाया और एक पुरानी अम्बेसडर कार ख़रीदी.

क्लिक करें मस्जिद तोड़े जाने ने समाज में दारार पैदा की: विश्लेषण

बेटा मोहम्मद इक़बाल इसे टैक्सी के तौर पर चलाते है, वह अक्सर हिंदू तीर्थयात्रियों को इसी टैक्सी में अयोध्या के मंदिरों के दर्शन कराते हैं.

हमने बाबरी मस्जिद की पैरवी ज़रुर की. लेकिन राजनीति फ़ायदा उठाने के लिए नही.

हाशिम अंसारी

हाशिम एक बात बड़े गर्व से कहते हैं, "हमने बाबरी मस्जिद की पैरवी ज़रुर की. लेकिन राजनीति फ़ायदा उठाने के लिए नही."

उनके एक साथी बताते हैं कि छह दिसंबर, 1992 के बाद एक बड़े नेता ने उनको दो करोड़ रुपए और पेट्रोल पम्प देने की पेशकश की तो हाशिम ने न केवल ठुकरा दिया बल्कि उस संदेशवाहक को दौड़ा दिया.

सादगी का रहन-सहन

हाशिम अंसारी और उनके परिवार का रहन-रहन नहीं बदला. उनके छोटे से कमरे में दो तखत पड़े हैं. यही उनका ड्राइंग रूम है और यही बेड रूम.

दीवार पर बाबरी मस्जिद की पुरानी तस्वीर टंगी है और घर के बाहर अंग्रेज़ी में बाबरी मस्जिद पुनर्निमाण समिति का बोर्ड.

मै पहुंचा तो हो हाशिम जांघिया पहने लेटे थे. जल्दी जल्दी लुंगी और कुरता पहना, सिर पर सफ़ेद टोपी लगाई और बातचीत के लिए तैयार हुए.

वर्ष 90 साल की उम्र में भी उनकी याददाश्त दुरुस्त है. वर्ष 1934 का बलवा भी उन्हें याद है, जब हिंदू वैरागी संन्यासियों ने बाबरी मस्जिद पर हमला बोला था.

वो बताते हैं कि ब्रिटिश हुकूमत ने सामूहिक जुर्माना लगाकर मस्जिद की मरम्मत कराई और जो लोग मारे गए उनके परिवारों को मुआवज़ा भी दिया.

सन 1949 में जब विवादित मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखी गई, उस समय प्रशासन ने शांति व्यवस्था के लिए जिन लोगों को गिरफ़्तार किया, उनमे हाशिम भी शामिल थे.

हाशिम कहते हैं, "चूँकि मै सोशल (मेलजोल रखने वाला) हूँ इसलिए लोगों ने मुझसे मुक़दमा करने को कहा और इस तरह मैं बाबरी मस्जिद का पैरोकार हो गया."

'हर हाल में अमन'

बाद में 1961 में जब सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने मुक़दमा किया तो उसमे भी हाशिम एक मुद्दई बने. पुलिस प्रशासन की सूची में नाम होने की वजह से 1975 की इमरजेंसी में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और आठ महीने तक बरेली सेंट्रल जेल में रखे गए.

यह भी एक वजह हो सकती है कि हाशिम ने कांग्रेस को कभी माफ़ नही किया. बाबरी मस्जिद मामले में हर क़दम पर वह कांग्रेस को दोषी मानते हैं.

अगर हम मुक़दमा जीत गए तो भी मस्जिद निर्माण तब तक नहीं शुरू करेंगे, जब तक कि हिंदू बहुसंख्यक हमारे साथ नहीं आ जाते.

हाशिम अंसारी

हाशिम सभी पार्टियों के मुस्मिल नेताओं के भी आलोचक हैं. बातचीत में हाशिम बार-बार जोर देते हैं, "हर हालत में हम अमन चाहते हैं, मस्जिद तो बाद की बात है."

हाशिम कहते हैं, "अगर हम मुक़दमा जीत गए तो भी मस्जिद निर्माण तब तक नहीं शुरू करेंगे, जब तक कि हिंदू बहुसंख्यक हमारे साथ नहीं आ जाते."

हाशिम अब अपनी निजी सुरक्षा को लेकर भी चिंतित हैं. उनका कहना है कि मुझे अयोध्या नहीं बाहर के लोगों से ख़तरा है, जो माहौल बिगाड़ने के लिए कुछ भी कर सकते हैं ताकि मुसलमान डर जाएँ.

हाशिम को शिकायत है कि पहले उनकी सुरक्षा में तैनात तीनों सिपाहियों के पास हथियार थे. अब उत्तर प्रदेश सरकार ने दो हथियार वापस ले लिए हैं. एक हथियार है जिससे तीनों सिपाही बारी बारी से आठ आठ घंटे डयूटी देते हैं.

हाशिम को आश्वस्त करने के लिए स्थानीय पुलिस अफसरों ने उनके घर के बगल ही पुलिस पिकेट तैनात कर दी है.

इसके बावजूद हाशिम के चेहरे पर चिंता के भाव हैं. हाशिम पहले कभी इतना चिंतित नहीं दिखे. चलते-चलते बार-बार कहते हैं - "हाल ख़बर लेते रहिए."

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.