टॉयलेट और महिलाएं

Image caption भारत में सार्वजनिक स्थानों पर टॉयलेटों की भारी कमी है.. महिलाओं के लिए तो और भी कम

भारत में सार्वजनिक शौचालयों की कमी और उनका रखरखाव समस्या है लेकिन अगर महिलाओं के लिए इन शौचालयों की बात करें तो समस्या विकराल है.

पुरुषों के इतर महिलाओं के लिए शौचालय अत्यंत ज़रुरी है लेकिन न तो शहरों में और न ही गांवों में कभी भी इस पर ध्यान दिया जाता है.

पुरुषों के लिए आसान है. जहां चाहा खड़े हो गए और निपट लिए लेकिन महिलाएं क्या करें.

आपको सुनने में ये छोटी सी समस्या लगे लेकिन ये है एक बड़ी समस्या क्योंकि पेशाब रोकने से महिलाओं को कई तरह की बीमारियां भी होती हैं.

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जानी मानी पत्रकार राधिका कहती हैं कि उन्होंने इस कारण कई परेशानियों का सामना करना पडा है. वो कहती हैं, ‘‘ मैं दौरे पर जाती हूं तो बड़ी मुश्किल होती है. रास्तों में कोई टॉयलेट नहीं मिलता है. यूपी बिहार में बहुत ख़राब हालत है. आप या तो सड़क पर कीजिए या फिर रोके रहिए. मैं बीमार पड़ी हूं तो डॉक्टरों ने कहा कि रोकना ख़तरनाक होता है.’’

कुछ महीनों पहले महिलाओं के लिए शौचालयों का मामला संसद में भी उठा था. शिक्षा को मूलभूत अधिकार बनाए जाने के मुद्दे पर हुई बहस में बीजेपी की एक नेता ने आकड़े गिनाते हुए साफ़ किया था कि गांवों में कई बच्चियां सिर्फ़ इसलिए स्कूल जाना बंद कर रही हैं क्योंकि वहां उनके लिए शौचालय उपलब्ध नहीं हैं.

जो शौचालय हैं उनकी स्थिति बेहद ख़राब है. इतनी ख़राब कि महिलाएं उनमें जाना ही पसंद नहीं करती हैं. मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी हालात कोई बहुत अच्छे नहीं है.

नए शहरों में मूलभूत सुविधाओं के मुद्दे पर डॉक्यूमेंट्री बना चुकी पारोमिता वोहरा बताती है, ‘‘देखिए जो नए शहर बन रहे हैं उनमें टॉयलेट्स के लिए कोई जगह नहीं है. महिलाओं के लिए तो और भी नहीं. महिलाओं के लिए टॉयलेट की गंदगी और भी ख़तरनाक होती है क्योंकि उन्हें इंफेक्शन जल्दी होता है. लेकिन सोचता कौन है इस बारे में.’’

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में टॉयलेट कम और मोबाइल फोन ज्यादा हैं. दिल्ली में 2007 के आकड़ों के अनुसार 3192 टॉयलेट थे जिसमें से मात्र 132 महिलाओं के लिए थे. समस्या टॉयलेटों की गंदगी और साइकोलॉजी की भी है.

पारोमिता कहती हैं, ‘‘ हमने अपनी फ़िल्म के लिए रिसर्च की तो पाया कि महिलाएं घर से बाहर बने टॉयलेट में जाना नहीं चाहती क्योंकि टॉयलेट गंदे होते हैं. दूसरा जब वो टॉयलेट जाती हैं तो पुरुष उन्हें गंदी नज़रों से देखते हैं.’’

Image caption भारत में सार्वजनिक टॉयलेट आम तौर पर अत्यंत गंदे होते हैं.

ये समस्या गांवों में भी ऐसी ही है. जहां महिलाएं या तो सूरज उगने से पहले या सूरज डूबने के बाद नित्य कर्म के लिए बाहर जाती हैं यानी कि अगर घर में टॉयलेट नहीं है तो आपको ज़रुरत पड़ जाए तो शाम तक कंट्रोल करते रहिए.

मेरे हिसाब से कभी किसी पुरुष को 10-12 घंटे तक मूत्र त्याग पर कंट्रोल करने की ज़रुरत नहीं पड़ी होगी लेकिन महिलाओं के लिए ये आम बात है.

पत्रकार राधिका कहती हैं, ‘‘मैं तो जब सुबह रिपोर्टिंग के लिए निकलती हूं दूरदराज़ के गांवों की तरफ तो पानी कम पीती हूं. चाय नहीं पीती हूं. कंट्रोल करना पड़ता है. पता नहीं कब मुश्किल हो जाए. अधिक दिक्कत होती है तो जंगल में जाती हूं क्या करुं. ’’

भारत में सार्वजनिक शौचालयों की अवधारणा ही बहुत नई है जो सुलभ ने शुरु की थी. सुलभ इंटरनेशनल के प्रमुख बिंदेश्वरी पाठक कहते हैं कि मसला संस्कृति का भी है.

वो कहते हैं, ‘‘ एक पुस्तक है दैवी पुराण. उसमें कहा गया है कि शौच घर से दूर करना चाहिए. कहां करना चाहिए. तीर चलाइए और जहां तीर गिरे वहां. यानी शौच दूर होना चाहिए घर से. यही कारण है कि शौचालय को लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं. हमने जब काम शुरु किया था साठ के दशक में तब लोग शौचालय पर बात तक नहीं करना चाहते थे. ’’

उल्लेखनीय है कि भारत में सुलभ इंटरनेशनल ने ही सार्वजनिक शौचालय बड़े पैमाने पर शुरु किए थे जो सफल भी रहे लेकिन कमी अभी भी है और बिंदेश्वरी पाठक इस बात को मानते भी हैं.

अब दुनिया बदल गई है. महिलाएं बाहर जा रही हैं. वो हर मामले में कंधे से कंधा मिलाकर पुरुषों के साथ चल रही हैं तो क्या उनके लिए पर्याप्त शौचालयों की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए.

पाठक कहते हैं, ‘‘ स्थिति पहले से सुधरी है लेकिन बहुत काम करने की ज़रुरत है. सरकार प्रधानमंत्री सड़क योजना चलाती है वैसे ही शौचालय योजना चलनी चाहिए. हुआ ये है कि लोग शौचालय के नाम पर पैसा कमाना चाहते हैं जबकि इसे स्वच्छता से जोड़कर देखना चाहिए. ये पैसे कमाने का साधन नहीं है.’’

पेशाब टट्टी शौच सुनने में ख़राब भले ही लगे लेकिन ये हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं और अगर इस पर रोक लग जाए तो जीना दूभर हो जाए.

भारत सरकार पता नहीं कब प्रधानमंत्री टॉयलेट योजना शुरु करेगी. करेगी या नहीं ये भी पता नहीं इसलिए कम से कम तब तक महिलाओं को कंट्रोल ही करना पड़ेगा.

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