इसराइली राजदूत की दरगाह में हाज़री

  • 3 सितंबर 2010
इसराइली राजदूत (चित्रः दीपक शर्मा)
Image caption ऐसा पहली बार हुआ है कि इसराइल के राजदूत दरगाह की ज़ियारत करने आए हों

अजमेर शरीफ़ में सूफ़ी संत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर एक अलग ही नज़ारा देखने में आया जब भारत में इसराइल के राजदूत मार्क सोफ़ेर ने वहाँ जा कर अक़ीदत के फूल पेश किए और अमन के लिए दुआ की.

सदियों पुरानी इस पवित्र दरगाह में ये पहला मौक़ा था जब किसी इसराइली राजदूत ने अपनी हाज़री दी हो.खुद सेफ़ोर ने कहा कि सूफ़ीवाद की तालीम और उसूलों से पूरे जहाँ को एक धागे में पिरोया जा सकता है.

सोफेर अपने साथियों के साथ अचानक दरगाह पहुंचे तो ख़ादिमों की संस्था अंजुमन के पदाधिकारियों ने उनकी अगवानी की.

इसराली राजदूत ने मज़ार शरीफ में चादर और अकीदत के फूल पेश किए. उस वक़्त रोज़ा इफ्तार का लम्हा आया तो दरगाह परिसर के आरकाट दालान में रोज़ेदारों ने रोज़ा खोला तो इसराइली राजदूत भी इसमें शरीक हुए.

एक खादिम के मुताबिक, सोफ़ेर वो सूफ़ियाना मंज़र देख कर बहुत प्रभावित हुए और कहा ये दिल पर गहरी छाप छोड़ता है.

इस मौक़े पर दरगाह के ख़ादिमों ने इसराइल में फ़लस्तीनियों के साथ हो रहे कथित दुर्व्यवहार पर नाराज़गी भी ज़ाहिर की.

नाराज़गी ज़ाहिर की

अंजुमन के एक सदस्य सरवर चिश्ती ने इसराइली राजदूत से साफ़ साफ़ कहा एक बार की हाजरी से चौदह सौ साल पुराना मसला हल नहीं हो सकता.

उनका कहना है, "हमने उनसे कहा कि इसराइल फ़लस्तीन में ज़ुल्मो सितम ख़त्म करे,ग़ज़ा पट्टी में फ़लस्तीनियों को उनका हक़ मिले. राज्य प्रायोजित आतंकवाद बंद हो, तभी शांति आ सकती है".

सरवर चिश्ती का कहना था, "एक खादिम के नाते हमने उनकी अगवानी की, ज़ियारत करवाई और मुसलमान होने के नाते हमने अपने जज़्बात से उन्हें रूबरू करवाया".

Image caption राजदूत के साथ इसराइली दूतावास के कुछ अन्य लोग भी थे

हालाँकि कुछ ख़ादिमों ने सांकेतिक तौर पर सोफ़ेर के दरगाह में हाज़री देने पर नाराज़गी ज़ाहिर की लेकिन साथ ही यह भी कहा कि ग़रीब नवाज़ का दर तो सबके के लिए खुला है.

एक ख़ादिम मोईन हसन चिश्ती ने बीबीसी से कहा, "यह तो एक महान फ़क़ीर की दरगाह है, इसके दरवाज़े तो सबके लिए खुले रहते है. हालाँकि नाराज़गी तो है. मगर इस महान हस्ती की चौखट पर तो कोई भी माथा टेक सकता है".

अंजुमन के एक सदस्य ने कहा कि सोफ़ेर की ऐसे ही अगवानी की गई जैसे ऐसे मौक़े पर किसी और ज़ायरीन की जाती है.

सोफेर आस्ताना से लौटे और आरकाट के दालान में आये तो रोज़ा खोला. वहीं उनकी दस्तारबंदी की गई.

ये दालान आरकाट के नवाब ने बनवाया था. वहीं पर अंजुमन का रजिस्टर मंगवाया गया जहाँ सोफ़ेर ने अपने विचार कलमबंद किये.

ये दरगाह वो मुक़द्दस मक़ाम है जो ना जात देखती है ना मज़हब. न रंग और न ही नस्ल. ये वो जगह है जहाँ दुनिया एकाकार नजर आती है. इसमें क्या राजा क्या रंक,ख़्वाजा के दरबार में तो सब बराबर है. उनमें एक राजदूत हो या कोई किसी मुल्क का हुक्मरान, सब बराबर हैं.

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