पानी हुआ कम, लोगों को राहत

बाढ़ में खाना बनाना
Image caption सरकार की तरफ़ से खाना तो आता है लेकिन पीड़ितों को वो पसंद नहीं आता.

दिल्ली के निचले इलाक़ों में यमुना का जलस्तर तो कम हो रहा है लेकिन लोगों की परेशानी कम नहीं हुई है.

जहां महिलाएं खाना बना रही हैं, ये सोचकर परेशान हैं कि बच्चे खाना कैसे खाएंगे, कैसे सोएंगे, वहीं कई पुरुष आराम फ़रमा रहे हैं. ख़ाली बैठे हैं और ताश खेलते नज़र आते हैं.

दिल्ली में लगातार हो रही बारिश और पिछले चार दिनों में हरियाणा के हथनीकुंड बराज से 9 लाख क्यूसेक से ज़्यादा पानी यमुना में छोड़े जाने से यमुना का जलस्तर बढ़ गया था. लेकिन अब यमुना से पानी जाने लगा है.

मगर इस बीच भी राहत नहीं हैं. दिल्ली अब भी बेहाल है. जिनका घर तीन मंज़िला है, उन्होंने छतों का सहारा लिया हुआ है, लेकिन जिनके मकान छोटे हैं, उनका आशियाना तो अब यमुना के पानी में दिखता भी नहीं.

यमुना में कईयों के घर डूब गए हैं. दिल्ली का न्यू उस्मानपुर हो या कश्मीरी गेट, गीता कॉलोनी हो या सिविल लाइंस, यमुना के सभी नज़दीकी इलाक़ों में लोगों का हाल बुरा है.

राहत एक छलावा

बीबीसी की टीम जब न्यू उस्मानपुर इलाक़े में गई तो देखा, सरकार ने राहत कैंप तो लगाए हैं लेकिन वो सिर्फ़ नाम के कैंप हैं.

सरकारी कैंपों में रह रही संतोष बेहद ग़ुस्से में बताती हैं कि किस तरह गाड़ी में बैठे सरकारी कर्मचारी आकर ऐसे सवाल पूछते हैं कि मानो उनके हालात का मज़ाक उड़ा रहे हों.

संतोष ने कहा, "बाल बच्चे कुत्ते बिल्ली सब ऐसे ही पड़े हैं. क्या मिल रहा है हमारे लिए. सब बड़े लोग पेट भर रहे हैं. गाड़ी में आते हैं बैठे हुए और पूछते हैं क्या हुआ? क्या हुआ? हुआ क्या. तुम्हारी आंखें फूटी हैं जो दिख नहीं रहा कि क्या हुआ? इससे अच्छा गोले डाल दो सब मर जाएंगे एक साथ.तुम्हारे लिए सही हो जाएगा."

Image caption जहां घर की महिलाएं खाना बनाती हैं वही कुछ पुरुष इन हालात में भी ताश खेलते नज़र आते हैं.

सरकार ने फुटपाथ पर राहत कैंप के नाम पर महज़ छोटी झुग्गियां बना दी हैं. पतले कपड़े की तो इनकी छत है. ये छत भी सिर्फ कहने भर के लिए ही हैं. बारिश के मौसम में एक एक बूंद के साथ छत का कपड़ी भी पानी बन जाता है.

सोने के लिए ना गद्दे हैं ना चटाई. पानी और मिट्टी में कीचड़ ही यहां रह रहे बच्चों का बिस्तर बन गया है.

इन राहत कैंपों में रह रहीं मोमिना के पांच बच्चे हैं और वो उन्हें अकेले ही पाल रही हैं. हमने देखा कि बहुत ही छोटी सी जगह पर, जहां बैठने के लिए एक टूटा फूटा से सोफ़ा रखा था, वहां उस पूरे परिवार को सोना पड़ रहा है.

कहीं लोगों को आस है कि उनकी स्थिति ज़रूर सुधरेगी तो कई बाढ़ में ताश के पत्ते खेलते नज़र आते हैं.

राहत कैंपों का जायज़ा करते हुए हम पहुंचे मुन्नी देवी के कैंप में जो परिवार के लिए खाना बना रही थीं. वहीं उनके पड़ोसी कैंप में ताश के पत्तियों की बाज़ी चल रही थी.

मुन्नी देवी के पति दिनभर रिक्शा चलाकर चंद पैसे कमा पाते हैं जबकि कई लोग ऐसे भी हैं जो ख़ाली समय में काम काज न कर मौज मस्ती कर रहे हैं और उनकी पत्नियां खाना बनाने, कपड़े धोने या फिर बच्चों को संभालने में ही व्यस्त दिखती हैं.

जानवरों जैसा खाना?

मोमिना बताती हैं कि सरकार की तरफ़ से खाना ऐसा आता है जो जानवर भी न खाएं.

मोमिना ने कहा, "सोने के लिए जगह नहीं है, देखिए रात कैसे कटी हमारी. ज़मीन पर बैठकर रात काटी हमारे बच्चों को लेकर, क्या करें? मजबूरी है हमारी. खाने के लिए चावल दे जाते हैं लेकिन अच्छे नहीं होते हैं. ऐसे चावल हैं जो जानवर भी नहीं खाते हैं."

न्यू उस्मानपुर के बाद सिविल लाइंस पहुंचे. ये ऐसी जगह है जहां रिहायशी इलाक़े के बीच लोग अपना छोटा मोटा व्यवसाय भी चलाते हैं.

किसी का ढाबा है तो किसी की किराने की दुकान. यहां भी बाढ़ का पानी भर गया है. लगभग 5 फ़ुट तीन इंच की लंबाई वाले गोपाल पानी के अंदर से गुज़रते हैं तो उनका चेहरा छोड़कर शरीर का कोई भी हिस्सा नज़र नहीं आता. बाढ़ से बेहाल गोपाल ने कहा कि इस गंदे पानी से बीमारी का भी ख़तरा फैल गया है.

गोपाल कहते हैं, "मुझे 32 साल हो गए यहां रहते हुए. यहां तो अब बीमारियां फैल रही हैं. दुकानदारों का देखो ना हाल क्या हो गया है. कौन आएगा हमें देखने?"

दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में बाढ़ आई लेकिन हर जगह जिससे भी बात करने जाओ या तो वो दुखी होकर बात करता है या बिल्कुल ग़ुस्से में. आठ साल की रेखा बार-बार अपनी मां से पूछती है," हम अपने घर कब जाएंगे?" कोई जवाब न मिलने पर भगवान से प्रार्थना करने लगती है, " हे भगवान, जल्दी से हमें हमारा घर वापस दे दो."

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