फ़ैसला टालने की अपील पर सुनवाई

बाबरी मस्जिद
Image caption बाबरी मस्जिद मामले में फ़ैसले को लेकर सरकार बेहद सतर्क है

अयोध्या के राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद की सुनवाई कर रही हाईकोर्ट की विशेष अदालत 17 सितंबर को एक प्रार्थनापत्र पर सुनवाई करेगी, जिसमें फिलहाल अदालत का फ़ैसला टालने की अपील की गई है.

प्रतिवादी रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने अदालत को दी गई एक दरखास्त में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के उस पैराग्राफ़ का उल्लेख किया है जिसमें कहा गया है कि इस तरह का संवेदनशील विवाद आपसी बातचीत और सहमति से तय होना चाहिए जिसमें कोई एक पक्ष अपने को हारा और दूसरे को जीता न समझे.

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी केंद्र सरकार के इस सवाल को नामंजूर करते हुए की थी, जिसमें अदालत से पूछा गया था कि क्या उस विवादित स्थान पर पहले कोई मंदिर तोड़कर मस्जिद बनायी गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने पूरा मामले हाईकोर्ट को निर्णय के लिए वापस भेज दिया था.

प्रार्थनापत्र में आशंका व्यक्त की गई है कि इस मामले में कोर्ट का जजमेंट आने से समाज का माहौल बिगड़ सकता है. दरखास्त में यह भी कहा गया है कि अंग्रेजों ने लोगों को धर्म के नाम पर लड़ाकर राज किया और यह सिलसिला अभी जारी है.

फैसला टालना मुश्किल

प्रार्थनापत्र में कहा गया है कि इस अदालत ने स्वयं भी सुनवाई पूरी होने के बाद 27 जुलाई को आपसी सहमति से मामले हल करने का प्रयास किया था, जो असफल रहा.

अयोध्या विवाद में हाईकोर्ट का जजमेंट टालने के लिए तीन अलग अलग दरखास्तें दी गई हैं. इनमें रमेश चन्द्र त्रिपाठी मुक़दमे का प्रतिवादी है, जबकि दो अन्य सामान्य नागरिकों द्वारा. लेकिन चूँकि उनका मुक़दमे से ताल्लुक नही इसलिए अदालत ने अभी उनका संज्ञान नहीं लिया.

मामले की सुनवाई कर रही विशेष पीठ के एक जज जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने प्रतिवादी रमेश त्रिपाठी के प्रार्थनापत्र का संज्ञान लेते हुए अदालत के विशेष अधिकारी से दरखास्त को रजिस्टर करके फैसले के लिए निर्धारित 24 सितंबर से पहले की तारीख लगाने को कहा था.

बाद में पीठ के तीनों जजों की सहमति से 17 सितम्बर की तारीख तय हुई.

सिविल प्रोसीजर कोड की धारा 89 में व्यवस्था है कि अदालत ऐसे मामलों का वादियों की परस्पर सहमति से हल करवाने का प्रयास कर सकती है.

इसी के तहत मुक़दमे के सभी पक्षों को नोटिस देकर सुनवाई में बुलाया गया है. साथ ही यह भी कहा गया है कि पक्षकारों के वकील मामले को आपसी सहमति से सुलझाने की कोशिश कर सकते हैं.

मामले के कुछ पक्षकारों का कहना है कि जजमेंट टालना मुश्किल होगा, क्योंकि एक जज पहली अक्टूबर को रिटायर हो रहे हैं.

मालूम हुआ है कि कश्मीर के बिगड़े हालात, नक्सलवादी गतिविधियों और कामनवेल्थ खेलों को देखते हुए सरकार भी चाहती है कि जजमेंट टल जाए तो बेहतर.

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