जांच करने वाले को राहत नहीं

धीरेंद्र कुमार राय
Image caption धीरेंद्र कुमार राय एक काबिल पुलिस अधिकारी है

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बहुचर्चित ताज हेरिटेज कॉरिडोर घोटाले की सीबीआई जांच में अहम भूमिका अदा करने वाले एक पुलिस अधिकारी का उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार लगभग ढाई साल से लगातार उत्पीड़न कर रही है और हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद इस अधिकारी को अब तक कोई राहत नही मिल पा रही है.

हाईकोर्ट ने दो महीने पहले अपने फ़ैसले में पुलिस उपाधीक्षक धीरेन्द्र कुमार राय का निलंबन समाप्त करने के अलावा उनको हुए मानसिक उत्पीड़न और अपमान पर राज्य सरकार पर तीन लाख रूपये का जुर्माना लगाया.

हाईकोर्ट ने राय को इस बात का अधिकार भी दिया किया कि वह उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ आपराधिक या अन्य कार्रवाई करें, जिन्होंने उनका उत्पीड़न किया.

इससे पहले हाईकोर्ट ने 20 जून 2008 को अपने अंतरिम आदेश में भी राय का निलंबन स्थगित कर दिया था.

लेकिन अब अंतिम फ़ैसले को भी क़रीब दो महीने बीत गए हैं और राज्य सरकार ने न तो उनकी बहाली की और न ही जुर्माने का पैसा जमा किया है. हाईकोर्ट के निर्णय में उनके उत्पीड़न का पूरा ब्योरा दिया गया है.

पुलिस उपाधीक्षक धीरेन्द्र कुमार राय उत्तर प्रदेश के कुछ चुनिन्दा अधिकारियों में है, जिसने समय समय पर कई गंभीर और संगीन अपराधों की जांच की और अपराधियों को गिरफ्तार किया.

सम्मानित अधिकारी

इसके लिए उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार, बिहार सरकार और केन्द्रीय जांच ब्यूरो सीबीआई से कई बार नकद इनाम और प्रशस्ति पत्र मिला. राष्ट्रपति ने उन्हें इंडियन पुलिस मेडल से भी सम्मानित किया.

राय वर्ष 1999 से 2006 तक सीबीआई में तैनात रहे और इस दौरान वह उस टीम के सदस्य थे, जिसने मुख्यमंत्री मायावती, उनके रिश्तेदारों और कांशीराम की बहनों से पूछताछ कर बयान रिकार्ड किए और उनकी अकूत संपत्ति का पता लगाया.

राय ने मायावती से लखनऊ और दिल्ली में लंबी बातचीत कर बयान दर्ज किए थे.

हाईकोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में उल्लेख किया है कि पुलिस अधिकारी ने अपनी खोजबीन से मायावती को फर्जी दान देने वाले लोगों के बारे में सबूत एकत्र किया.

उल्लेखनीय है कि मायावती अपनी संपत्ति का मुख्य स्रोत अपने समर्थकों से प्राप्त दान बताती हैं.

Image caption अदालत ने निलंबन रद्द करने के अलावा तीन लाख रूपये का जुर्माना भी लगया है

राय जुलाई 2006 में सीबीआई की सेवा से वापस उत्तर प्रदेश पुलिस में आ गए.

मई 2007 में सुश्री मायावती के सत्ता में वापस आते ही राय की परेशानियां शुरू हो गयीं. उनके लगातार कई तबादले हुए.

21 जुलाई 2007 को जब वे एसटीएफ में तैनात थे, तो चित्रकूट के जंगल में उनकी टीम की मुठभेड़ ठोकिया गैंग से हो गई. मुठभेड़ में एक डकैत मारा गया. राय और उनकी टीम जंगल में फंस गई.

सारे बड़े अधिकारियों को उन्होंने दो दर्जन से अधिक बार मोबाइल पर फोन करके अतिरिक्त फ़ोर्स मांगी. लेकिन कोई मदद नही आई. जंगल से वापसी में ठोकिया गैंग ने राय की टीम पर हमला किया. राय तो बच गए लेकिन, छह पुलिस वाले मारे गए.

सरकार ने उन अफसरों पर तो कोई कार्रवाई नहीं की , जिन्होंने राय की टीम की मदद के लिए फ़ोर्स नही भेजी. उलटे राय के ख़िलाफ़ ही जांच बैठा दी. फिर 19 मई 2008 को यह आरोप लगाते हुए राय को निलंबित कर दिया कि उन्होंने ठीक से टीम का नेतृत्व नही किया और स्थानीय पुलिस से मदद नही ली.

अपने निलंबन के खिलाफ राय हाईकोर्ट गए और अपनी याचिका में कहा कि उन्हें दुर्भावना पूर्वक सिर्फ इसलिए सताया जा रहा है, क्योंकि उन्होंने सीबीआई में रहते हुए मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले की जांच की थी.

अदालत ने उनके निलंबन को स्थगित कर दिया, किन्तु उत्तर प्रदेश सरकार ने इसका पालन नही किया. सरकार सुप्रीम कोर्ट गई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को नही रोका. सुप्रीम कोर्ट ने मामले को निस्तारण के लिए वापस हाईकोर्ट को भेज दिया.

जुर्माना

15 जुलाई 2010 को दो जजों की खंडपीठ ने अपने अंतिम निर्णय में राय का निलंबन रद्द करते हुए जो आदेश लिखाया है उसमें पूरी उत्तर प्रदेश सरकार और यहाँ की नौकरशाही को राय का उत्पीड़न करने के लिए धोखाधड़ी, झूठे एवं फर्जी सबूत बनाने और विद्वेषपूर्ण कार्यवाही का दोषी पाया गया है.

Image caption सुप्रीम कोर्ट ने ताज हेरिटेज कॉरिडोर घोटाले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे

इसीलिए अदालत ने निलंबन रद्द करने के अलावा तीन लाख रूपये का जुर्माना भी ठोंका है. इसमें से दो लाख रूपए राय को मिलने हैं.

हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि सरकार उन अधिकारियों से यह जुर्माना वसूल कर सकती है, जिन्होंने ऎसी गैरकानूनी कार्यवाही की. अदालत ने कहा है कि सरकार तो गृह एवं पुलिस विभाग के ऐसे अफसरों पर कार्रवाई कर ही सकती है, राय स्वयं भी इन अफसरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए स्वतंत्र हैं.

अदालत ने मुख्य सचिव से उन पुलिस अफसरों के खिलाफ अलग से कार्रवाई के लिए कहा है, जिन्होंने राय की बारंबार गुहार पर भी अतिरिक्त फ़ोर्स उनकी मदद के लिए नही भेजी.

अदालत ने सुप्रिम कोर्ट के कई पुराने फैसलों, महात्मा गांधी और महर्षि अरविंदो के उद्धरणों का हवाला अपने निर्णय में दिया है और कहा कि उत्तर प्रदेश की नौकरशाही कितने नीचे गिर गई है.

अदालत ने फैसले में कहा, "अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई शुरू करने के के लिए फर्जी कागजात बनाए. सबूत गढ़ने के लिए धोखाधड़ी की गई. इस धोखाधड़ी के कारण सारी कार्रवाई दूषित हो गई."

इन सब के बीच केवल एसटीएफ के तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक शैलजाकांत मिश्र राय के पक्ष में गवाही देने का साहस जुटा सके. उन्होंने इस बात की तस्दीक की कि राय न केवल उन्हें बल्कि अन्य अफसरों और जिला पुलिस को मोबाइल फोन पर सूचित कर मदद मांगी. यह भी कि इसकी पूरी जानकारी तत्कालीन पुलिस माहानिदेशक विक्रम सिंह को दी गई.

राय ने अपनी याचिका में अपने उत्पीड़न के लिए मुख्य रूप से मुख्यमंत्री मायावती को जिम्मेदार बताया है, लेकिन उन्हें औपचारिक प्रतिवादी नहीं बनाया. बहस के दौरान उनके वकील ने अदालत से कहा कि वह मुख्यमंत्री को औपचारिक रूप से प्रतिवादी बनाने कि हिम्मत नहीं रखते.

चूँकि मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी नही थी और उन्हें अपनी सफाई का मौक़ा नहीं मिला, इसलिए अदालत ने उन पर सीधे टिपण्णी नहीं की. मगर मुख्यमंत्री स्वयं गृह मंत्री हैं, इसलिए अदालत की टिप्पणी परोक्ष तौर पर उन्ही पर टिप्पणी मानी जाती है.

मामले में औपचारिक रूप से प्रमुख गृह सचिव एवं अन्य अधिकारियों को प्रतिवादी बनाया गया था और निर्णय के अनुपालन के लिए वही जिम्मेदार हैं. सरकार की ओर से प्रमुख सचिव से बात करने की कोशिश बेकार रही.

राय सिर्फ इतना कहते हैं कि वह अदालत का फैसला लागू होने का इंतज़ार कर रहे हैं.

संबंधित समाचार