कश्मीर की हिंसा पर सर्वदलीय बैठक

  • 15 सितंबर 2010
कश्मीर में हिंसक प्रदर्शन

भारत प्रशासित कश्मीर पर हो रही सर्वदलीय बैठक का सभी राजनीतिक दलों ने स्वागत किया है. लेकिन इस बैठक में इन पार्टियों का क्या रुख़ रहेगा वो स्पष्ट हो चुका है.

इस बैठक से पहले विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.

कश्मीर घाटी में जारी हिंसा पर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का कहना था कि राज्य में सरकार नाम की कोई चीज़ ही नहीं हैं.

उन्होंने कहा जम्मू-कश्मीर में जो भी हो रहा है उसके लिए राज्य ही नहीं,केंद्र सरकार भी ज़िम्मेदार है.

लालकृष्ण आडवाणी का कहना था,'' यूपीए सरकार को स्थिति का अंदाज़ा ही नहीं है और वो कोई भी निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं जिससे हर रोज हमारी इस आशंका को बल मिल रहा है कि वो पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों के सामने घुटने टेक रही है.''

इतना ही नहीं लालकृष्ण आडवाणी ने चेतावनी दी है कि अगर राज्य में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के असर को कम किया गया या हटाया गया तो उसके परिणाम ठीक नहीं होंगे. भाजपा सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हटाने का कड़ा विरोध कर रही है.

भाजपा का कहना है इससे सुरक्षाबलों का मनोबल कम होगा, तो दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ चालक मोहन राव भागवत ने इस मामले पर केंद्र और राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया और स्वायतता जैसे मुद्दों को सिरे से ख़ारिज कर दिया.

उल्लेखनीय है कि पिछले महीने ही प्रधानमंत्री ने समस्या का समाधान निकालने के एक विकल्प के तौर पर स्वायतता का प्रस्ताव दिया था इस पर राजनीतिक पार्टियों की मिली जुली प्रतिक्रिया आई थी.

इधर सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के अधिकारों को कम करने या हटाने की आंशका पर एयर मार्शल पीवी नाइक ने कहा कि इस अधिनियम का असर कम किए जाने की स्थिति में सुरक्षाबलों को क़ानूनी संरक्षण दिया जाना चाहिए. स्थिति पर चिंता

रक्षा मंत्री एके एंटनी ने भी कश्मीर घाटी की स्थिति पर चिंता जताई है.

मंगलवार को रक्षा समारोह में हिस्सा लेने के बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि सरकार सर्वदलीय बैठक के बाद कश्मीर के बारे में कोई निर्णय लेगी.

एंटनी ने कहा कि महत्वपूर्ण फैसले सभी पहलुओं पर सावधानी से विचार-विमर्श करने के बाद लिए जाएंगे.

उन्होंने कहा कि सुरक्षा मामलों पर मंत्रिमंडल की समिति की बैठक में हमने तय किया कि अंतिम निर्णय करने से पहले सभी प्रमुख दलों को विश्वास में लिया जाए ताकि निर्णय में सबकी हिस्सेदारी हो.

हालांकि केंद्र सरकार ने सोमवार को सुरक्षा मामलों पर कैबिनेट की बैठक बुलाई थी, लेकिन कोई समाधान नही निकल पाया था.

ग़ौरतलब है कि कश्मीर में जारी हिंसा में अब तक 70 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. सरकार एक बीच का रास्ता निकालने के लिए आमराय बनाने की कोशिश कर रही है.

बुधवार को होने वाली सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दल तय करेंगे कि राज्य में बातचीत की प्रक्रिया को कैसे आगे बढ़ाना है.

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