तेलंगाना में वकील भी नाराज़

Image caption आंदोलन एक बार फिर ज़ोर पकड़ता दिख रहा है

आंध्र प्रदेश में तेलंगाना राज्य के लिए चल रहे आंदोलन ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के बाद अब न्यायालय को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है. आंध्र प्रदेश उच्य न्यायालय और दूसरी अदालतों में काम काज ठप्प पड़ गया है.

तेलंगाना के वकीलों ने न्यायालय की नौकरियों में अपने लिए 42 प्रतिशत आरक्षण की मांग करते हुए पूरे तेलंगाना क्षेत्र में अदालतों के बहिष्कार का आह्वान किया है जिसके चलते अदालतों में काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है.

उच्च न्यायालय में तीन वकील पिछले तीन दिनों से आमरण अनशन पर हैं और वहां तनाव बढ़ता जा रहा है. आज उस समय वकीलों और पुलिसवालों के बीच तनातनी हो गई जब पुलिस ने भूख हड़ताल पर बैठे वकीलों को देखने के लिए आने वाले दूसरे वकीलों को अंदर आने से रोक दिया.

कुछ वकीलों ने ज़बरदस्ती घुसने की कोशिश की और कुछ सड़क पर धरना देकर बैठ गए.

हैदराबाद के पुलिस आयुक्त अब्दुल कय्यूम खान का कहना था कि कल की घटनाओं के मद्देनज़र सुरक्षा कड़ी कर दी गई है क्योंकि कुछ वकीलों ने अदालत नंबर 32 में घुसकर गड़बड़ी की और वहाँ कारवाई चलने नहीं दी.

स्थिति को बिगड़ता देखकर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मीना कुमारी की अध्यक्षता में तमाम जजों की एक बैठक हुई जिसके बाद पुलिस को उच्य न्यालय से हट जाने का आदेश दे दिया गया.

तेलंगाना के वकीलों की संयुक्त कार्य समिति की मांग है कि गवर्नमेंट प्लीडर और पब्लिक प्रॉसीक्यूटर जैसे पदों पर 42 प्रतिशत आरक्षण तेलंगाना वालों को दिया जाए क्योंकि न्यायालय में अधिकतर नौकरियां तेलंगाना से बाहर के लोगों मिलती रही हैं.

विरोध जारी

समिति के संयोजक रंगा राव के कहना है कि पिछले साठ वर्षों में एक बार भी एडवोकेट जनरल का पद तेलंगाना के किसी वकील को नहीं दिया गया और उन के साथ हमेशा भेदभाव किया गया.

उच्य न्यायालय के अलावा हैदराबाद और तेलंगाना प्रांत की दूसरी अदालतों में भी काम प्रभावित हुआ है. वकीलों का कहना है कि जब तक उनकी मांग स्वीकार नहीं की जाती वो अपना आंदोलन जारी रखेंगे.

इधर आंध्र प्रदेश सरकार ने इन मांगों पर विचार के लिए तीन मंत्रियों की एक उप-समिति बनाई है जो वकीलों से बात करेगी.

इस समिति की सदस्य और सूचना मंत्री गीता रेड्डी ने कहा की वकीलों का आंदोलन ठीक नहीं है और उन्हें उच्च न्यायालय में कानून व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं करना चाहिए.

वकीलों ने यह आंदोलन एक ऐसे समय पर शुरू किया है जब तेलंगाना के छात्रों और युवाओं के संगठन पहले ही से ग्रुप वन की नौकरियों में अपने लिए 42 प्रतिशत कोटे की मांग कर रहे हैं और उन्होंने राज्य की पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षाओं का बहिष्कार किया है.

वैसे भी तेलंगाना राज्य की लड़ाई अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच रही है. इस मांग पर विचार के लिए बिठाई गई श्रीकृष्ण समिति ने अपना काम लगभग पूरा कर लिया है और वो दिसंबर तक अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को देने वाली है.

अलग राज्य के लिए लड़ने वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति ने धमकी दी है कि समिति की रिपोर्ट आने के बाद भी अगर केंद्र तेलंगाना राज्य स्थापित नहीं करती है तो गृह युद्ध की नौबत आ जाएगी.

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