अयोध्या विवाद पर फ़ैसला टालने पर सुनवाई

बाबरी मस्जिद

अयोध्या के ऐतिहासिक रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद का फ़ैसला अगले हफ्ते हो या न हो इसको लेकर संशय पैदा हो गया है.

विवाद की सुनवाई कर रही हाईकोर्ट की विशेष अदालत शुक्रवार को दोपहर ढाई बजे एक प्रार्थनापत्र पर सुनवाई करेगी जिसमें फि़लहाल अदालत का फ़ैसला टालने और मामले को समझौते से हल कराने की बात की गई है.

लेकिन विवादित स्थल के प्रमुख दावेदारों ने इसका विरोध किया है. उनका कहना है कि अदालत पूर्व निर्धारित तिथि 24 सितम्बर को अपना फ़ैसला सुनाए.

मुक़दमे के एक प्रतिवादी रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने अपने प्रार्थनापत्र में 1994 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के एक पैराग्राफ का उल्लेख किया है जिसमें कहा गया है कि इस तरह का संवेदनशील विवाद आपसी बातचीत और सहमति से तय होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी केंद्र सरकार के इस सवाल को नामंजूर करते हुए की थी जिसमें अदालत से पूछा गया था कि उस विवादित स्थान पर पहले कोई मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने मामले को हाईकोर्ट को निर्णय के लिए वापस भेज दिया था.

सुप्रीम कोर्ट की इस 16 साल पुरानी टिप्पणी का हवाला देते हुए प्रार्थनापत्र में आशंका व्यक्त की गई है कि कोर्ट का फ़ैसला आने से देश में हिंसा भड़क सकती है.

आपसी सहमति की कोशिशें

प्रार्थनापत्र में कहा गया है कि इस अदालत ने स्वयं भी सुनवाई पूरी होने के बाद 27 जुलाई को आपसी सहमति से मामले हल करने का प्रयास किया था जो असफल रहा. लेकिन अदालत ने कहा था कि मुक़दमे के वादी प्रतिवादी कभी भी समझौते से मामला हल कर सकते हैं .

प्रार्थनापत्र में सिविल प्रोसीजर कोड की धारा 89 का हवाला दिया गया है कि कि अदालत ऐसे मामलों का वादियों की परस्पर सहमति से हल करवाने का प्रयास कर सकती है.

मगर मुक़दमे के एक पक्षकार हिंदू महासभा के वकील हरिशंकर जैन का कहना है कि अब समझौते से मामले हल करने की कोई गुंजाइश नही है.

हरिशंकर जैन ने कहा,'' हिंदू पक्ष यह साफ़ कर चुका है कि चूँकि यह राम जन्मभूमि का मामला है इसलिए इसकी एक इंच भी जमीन पर समझौता नही हो सकता. इस समझौते की बात के पीछे कोई राजनीतिक साजिश है जो नहीं चाहती कि यहाँ क़ानून का राज हो और अदालत अपना काम कर सकें और फैसला दे सके.''

हिंदू महासभा के अलावा सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने भी अदालत को लिखकर दे दिया है कि अब फ़ैसला टालने का कोई कारण नहीं बनता.

बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति के पूर्व संयोजक मोहम्मद आज़म खान ने समझौते की बात को एक मजाक बताया और कहा कि अदालत को क़ानून के अनुसार अपना फैसला देना चाहिए.

साथ ही उन्होंने ने यह भी कहा अदालत का जो भी फैसला आए किसी को उस पर बहुत उत्साह या नाराज़गी नहीं प्रकट करनी चाहिए और संयम से काम लेना चाहिए. अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी जाएगा.

विवादित स्थल के अन्य प्रमुख दावेदार निर्मोही अखाड़े के वकील रणजीत लाल वर्मा ने कहा कि प्रतिवादी रमेश त्रिपाठी की भावना अच्छी है मगर समझौते के लिए अब बहुत देर हो चुकी है.

मामले कि सुनवाई करने वाली विशेष पीठ के एक जज धर्मवीर शर्मा एक अक्टूबर को रिटायर हो रहे हैं. अगर तब तक फ़ैसला नही आया तो पूरे मामले कि सुनवाई फिर से करनी पड़ेगी.

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