बदली-बदली सी थी अयोध्या की आबोहवा

  • 17 सितंबर 2010
अयोध्या

फैज़ाबाद की पैदाइश होने की वजह से बचपन से ही किसी छुट्टी पर हमें फैज़ाबाद और उसके आसपास के ऐतिहासिक जगहों पर घुमाने ले जाया जाता था. इस दौरान आमतौर पर मेरे दादा साथ में होते थे और उनकी ही देखरेख में चलता था खाने-पीने का सामान.

बहू बेगम का मक़बरा, जिस मध्यकालीन इमारत के इर्द-गिर्द ही मुज़फ्फर अली की फ़िल्म 'उमराव जान' को फ़िल्माया गया था.

'गुलाब बाड़ी' कहते हैं कि जब 18वीं सदी में अवध रियासत के नवाब फ़ैज़ाबाद में रहते थे तो कश्मीर से आई गुलाबों की एक खेप से इस फुलवारी को आबाद किया गया था.

चौक में स्थित तीन दरवाज़ों जिनसे गुजरने पर शुरू होती थी फैज़ाबाद में अवध की रियासत, अयोध्या में राम की पौड़ी और गुप्तार घाट, दंतकथाओं के मुताबिक़ राम ने यहीं पर जल समाधि ली थी.

अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के आसपास का इलाका भी था हमारे लिए एक लोकप्रिय स्थान था.

बचपन की यादें

उस इमारत का ढांचा मुझे आज भी याद आता है. दूर से ही देखने पर एक बड़ा और दो छोटे गुम्बद नज़र आते थे.

इस ढाँचे के इर्द-गिर्द थोड़ी खुली जगह भी थी. पूरे प्रांगण को करीब पांच फुट लंबी सलाखों से घेरा गया था. जब मैं पहली बार इस ढाँचे के भीतर गया तो थोड़े डर के साथ, वजह था अंदर फैला हुआ घुप्प अँधेरा.

अंदर घुसते ही आपको एक चबूतरे से नीचे दिखाया जाता था और बताया जाता था की रामलला यहीं पैदा हुए थे. उस जगह को गर्भगृह का नाम दिया गया था.

कम उम्र होने के नाते मुझे और मेरे छोटे भाई को हमेशा इस बात की जिज्ञासा रहती थी कि आखिर अंदर और क्या-क्या है.

दूर से तो बस एक तख़्त पर स्थापित छोटी सी मूर्ती ही दिखाई पड़ती थी, लेकिन वह जिज्ञासा आज भी बनी हुई है क्योंकि उस तहखानेनुमा जगह में कभी जाकर देखने का मौका नहीं मिला.

इमारत की बात करें तो मुझे साफ़ तौर पर याद है कि उस मंदिर या मस्जिद का निर्माण भीतर से देखने पर थोड़ा खटकता ज़रूर था. क्योंकि इमारत का निचला भाग तो बेहद पुराना और जर्जर सा दिखता था जिसमे खंभों पर हनुमान आदि की टूटी हुई प्रतिमाएँ बनी हुईं थीं और दीवारों में टूटे हुए कलश साफ़ देखे जा सकते थे. लेकिन भीतर से ही ऊपर देखने पर जो गुंबद था वो निचले हिस्से से विपरीत थोड़ी बेहतर हालत में दिखाई पड़ता था.

इमारत के निचले हिस्से के निर्माण में फर्क साफ़तौर पर दिखता था. मैंने अपने जीवन में शायद वह पहली मस्जिद देखी थी जिसके इर्द-गिर्द मीनारें नहीं बनी हुई थीं.

कारसेवकों का कारवाँ

आइए अब चलते हैं 1992 में. उन दिनों मैं लखनऊ में स्कूल जाता था. चूंकि फैज़ाबाद में भी घर था तो गर्मी की छुट्टियों और छमाही परीक्षा ख़त्म होते ही हम दोनों भाई फैज़ाबाद की सैर पर रवाना कर दिए जाते थे.

छोटा शहर होने के नाते तमाम लोग जान-पहचान के थे. उनसे मिलकर किस्सागोई में मज़ा तो बचपन से ही आता था. लेकिन 1992 में दिसंबर की छुट्टियाँ मुझे जीवनभर याद रहेंगी, ऐसा कभी सोचा भी नहीं था.

नवंबर के आखिरी हफ़्ते में जब हम लखनऊ से फैज़ाबाद की 135 किलोमीटर की दूरी अपनी कार से तय कर रहे थे तो रास्ते में राम सनेही घाट पर करीब चार-पांच सौ कथित कार सेवकों को सड़क किनारे बने ढाबों में चाय-नाश्ता करते देख कर थोड़ा चौंका था.

आगे भी रास्ते में बसों और ट्रैक्टर-ट्रालियों में भरे माथे पर गेरुए रंग की पट्टी बांधे कारसेवक अयोध्या-फैज़ाबाद की ओर बढ़ रहे थे.

मुझे असल हैरानी तब हुई जब फैज़ाबाद शहर में प्रवेश करते ही वहाँ का माहौल छावनी की तरह नज़र आया. समझते देर नहीं लगी कि मामला अब वाकई गंभीर हो चुका है. घर पहुँचने पर पता चला कि शहर में तेवर काफी तीखे हैं. तमाम लोग आने वाले दिनों के लिए राशन-पानी जमा कर रहे थे. कुछ ऐसे भी थे जो कारसेवकों की कथित तौर पर सेवा-टहल में जुटे थे.

खैर, छह दिसंबर आते-आते तमाम हिंदू और मुस्लिम संगठनों के नेता और कार्यकर्ता शहर में पहुँच चुके थे.

छह दिसंबर का दिन

अखबारों में प्रशासन के दावे रोज-रोज छप रहे थे कि माहौल नियंत्रण में है, चिंता कि कोई बात नहीं. राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद ढांचे को कोई नुक़सान नहीं पहुँचेगा.

मैं बता दूँ कि छह दिसंबर कि सुबह भी हमारे घर दूध देने वहीं आए जो पिछले 27 सालों से देते आ रहे थे, मजीद चचा. वह भी सात किलोमीटर दूर से साइकिल की सवारी करके.

उस दिन मुझे शहर कि आबोहवा थोड़ी बदली-बदली सी लगी. हालाँकि हमें घर से बहार न निकलने की सख्त हिदायत दी गई थी. लेकिन शहर के बीचों-बीच रिकाबगंज इलाक़े में घर होने के नाते हमें अपनी छत की मुंडेर पर खड़े होकर अयोध्या जाने वाली रोड देखने की मनाही नहीं थी.

इसलिए छह दिसंबर की दोपहर के कई घंटे हमने छत पर टंगे हुए बिताए. शहर में पहले से ही धारा-144 लागू थी.

शाम होते-होते हमें पता चल गया कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का ढांचा गिर चुका है. प्रशासन ने फैज़ाबाद और अयोध्या में कर्फ्यू लगा दिया है. हालांकि छह दिसंबर के बाद अगले सात दिन मैंने फ़ैजाबाद में ही बिताए लेकिन कहीं से भी किसी अनहोनी कि खबर नहीं मिली.

आज जब उस दिन को याद करता हूँ तो ज़हन में दो ही बातें आती हैं, एक तो यह कि अपने दादा के साथ जिन इमारतों को बचपन में देखा था, 1992 के बाद उनमें से एक कम हो गई है. दूसरी यह कि छह दिसंबर के दिन फैज़ाबाद के सबसे भीड़-भाड़ वाले रिकाबगंज में आसमान एकदम साफ़ और शांत था.

यह बात एकदम असामान्य थी क्योंकि साल के बारहों महीने, तीन सौ पैंसठ दिन रिकाबगंज चौक, फैजाबाद के आसमान में पतंगबाजी होती रहती है. हर छत से रह रह कर आवाजें आती रहती हैं, वोह काटा, वोह काटा!

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