मुंबई और झोपड़पट्टियाँ

मुंबई झोपड़पट्टी
Image caption मुंबई की झोपड़पट्टियों में ख़ासकर बारिश के मौसम में जीना दुश्वार हो जाता है

डेढ़ करोड़ से ज़्यादा की आबादी वाले मुंबई महानगर के करीब 55 प्रतिशत लोग झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं.

सबसे आश्चर्य की बात ये है कि ये झुग्गियां मुंबई की मात्र छह से 10 प्रतिशत ज़मीन पर बनी हैं.

हमने जब लोगों से पूछा कि क्या मुंबई से झोपड़पट्टियाँ हट सकती हैं, तो एक विचार सामने आया कि झोपड़पट्टियों की समस्या पूरी दुनिया में है.

दुनिया के बड़े-बड़े शहर झोपड़पट्टियों की वजह से बदनाम रहे हैं.

मुंबई में भी पहले झोपड़पट्टियों को हटाने की बात होती थी. अब झोपड़पट्टियों में लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाने की बात हो रही है.

स्लम रिहैबिलिटेशन एक्ट

डी अफ़ज़लपुरकर कमेटी की 1995 में पेश की गई रिपोर्ट के बाद एसआरए (स्लम रिहैबिलिटेशन एक्ट)योजना की शुरुआत हुई थी.

वर्ष 1995-96 में लोगों से वादा किया गया था कि झोपड़ों में रहने वाले 40 लाख लोगों के लिए पाँच साल में आठ लाख घर बनेंगे और उन्हें मुफ़्त घर दिए जाएंगे.

Image caption मुंबई की आबादी क़रीब डेढ़ करोड़ की है. इसका 55 प्रतिशत झोपड़पट्टियों में रहता है.

लेकिन 15 साल बाद भी इस लक्ष्य का एक छोटा हिस्सा ही हासिल हो पाया है.

डी अफ़ज़लपुरकर कहते हैं कि "कई समस्याओं के बावजूद पूरी स्कीम को ख़त्म नहीं किया जा सकता. सबसे पहले हमें सबसे ज़रूरतमंद इलाकों में स्कीम को लागू करने पर ध्यान देना चाहिए. स्कीम में फेरबदल होनी चाहिए. मुफ़्त मकान की जगह झोपड़पट्टियों में रहने वाले लोगों से लागत का एक हिस्सा वसूलना चहिए."

"अगर किसी व्यक्ति को मकान दिया जाता है तो मकान को दूसरे किसी व्यक्ति को हस्तांतरण करने के बारे में कड़े कानून होने चाहिए. बिल्डर के चुनाव की प्रक्रिया साफ़-सुथरी होनी चाहिए. और सबसे महत्वपूर्ण ये कि आम लोगों को इस प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए."

एसआरए में धाँधलियाँ

दरअसल एसआरए में धाँधलियाँ कई तरह की हैं.

लोगों को मुफ़्त मकान मिलता है तो वो कई बार उसे या तो किराए पर चढ़ा देते हैं या फिर बेचकर कहीं और रहने लगते है.

झूठे कागज़ बनवाना आम बात है. इसलिए जिन्हें असल में मकान की ज़रूरत है उन्हें फ़ायदा नहीं पहुँच पाता.

अफ़ज़लपुरकर बिल्डर लॉबी पर नियंत्रण की बात करते हैं. वो कहते हैं कि पूरी प्रक्रिया का ग़ैर-केंद्रीयकरण होना चाहिए और सरकार को मात्र प्रक्रिया का निरीक्षण करना चाहिए.

इस मामले से लंबे समय से जुड़े रहे शैलेश गाँधी का कहना है कि लोगों को सस्ते घर देने की प्रक्रिया में सरकार को महत्वपूर्ण भूमिका अपनानी चाहिए और बिल्डरों की भूमिका निश्चित होनी चाहिए।

शैलेश गाँधी कहते हैं कि "पीपीपी यानि पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप का मतलब बन गया है कि पब्लिक दे और प्राइवेट यानि निजी लोग लें. अगर आप 30 से 50 लाख के फ़्लैट्स किसी को मुफ़्त देते हैं तो ये भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलेगा."

उधर स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी के सीईओ एस ज़ेंडे कहते हैं कि "आगे का रास्ता ये है कि स्कीम को बजट से आर्थिक सहयोग मिले. उनके मुताबिक अगर मुफ़्त मकान देने का सिलसिला जारी रहा, तो स्कीम को जारी रखना मुश्किल हो जाएगा."

कुछ और लोगों का कहना है कि ये स्कीम तभी मददगार हो सकती है जब बिल्डरों की भूमिका को नियंत्रित किया जाए और उनकी समस्याओं की सुनवाई में पारदर्शिता हो.

यानि आम लोगों के नाम पर बनाए जा रहे मकानों में आम लोगों की भूमिका निर्धारित हो.

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