वार्ता चल रही थी: निर्मोही अखाड़ा

बाबरी मस्जिद विध्वंस से पहले (फ़ाइल फ़ोटो)

अयोध्या में विवादित धार्मिक स्थल के एक प्रमुख दावेदार निर्मोही अखाड़ा का दावा है कि मुक़दमे से जुड़े अयोध्या के स्थानीय मुस्लिम पक्षधरों से उनकी बातचीत चल रही थी, लेकिन एक बिंदु पर गतिरोध होने से परिणाम नहीं निकल पाया.

उनका दावा है कि इसे हैदराबाद और लखनऊ के कुछ मुस्लिम नेताओं ने रुकवा दिया. लेकिन बाबरी संघर्ष समिति के संयोजक ज़फ़रयाब गिलानी ने इस बात का खंडन किया है कि ऐसी कोई बातचीत चल रही थी.

उल्लेखनीय है कि जिस स्थल पर बाबरी मस्जिद हुआ करती थी उसके विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपनी सुनवाई पूरी कर ली है और 24 सितंबर को इसका फ़ैसला आना है.

निर्मोही अख़ाड़े के लोगों का कहना है कि 27 जुलाई को जब सुनवाई समाप्त हुई थी तब अदालत ने कहा था कि यदि समझौते की कोई संभावना बने तो फ़ैसला आने से पहले अदालत के विशेष कार्य अधिकारी से संपर्क किया जा सकता है.

Image caption निर्मोही अखाड़े के लोगों मानते हैं कि विवाद अब भी बातचीत से सुलझ सकता है

अब तक इस मसले को बातचीत से सुलझाने की बात की जाती रही है लेकिन दोनों पक्षों के बीच कभी सहमति नहीं बन सकी.

बातचीत का दावा

निर्मोही अखाड़े से जुड़े लोगों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों से उनकी बातचीत अयोध्या में रहने वाले और मुक़दमे से जुड़े कुछ प्रमुख मुस्लिम नेताओं से हो रही थी.

उनका कहना है कि इस बातचीत में कई बिंदुओं पर सहमति बनी, लेकिन एक ख़ास बिंदु पर सहमति नहीं बन पाई थी.

अयोध्या निवासी और निर्मोही अखाड़ा के वकील रंजीत लाल वर्मा कहते हैं,"बातचीत अयोध्या में कुछ स्थानीय लोगों से शुरू हुई थी. कुछ बात बढ़ी थी, लेकिन पता नही क्यों केवल एक मुद्दे पर बात अटक गई जिसकी पुष्टि लखनऊ से होनी थी."

निर्मोही अखाड़ा का कहना है कि विवादित मस्जिद के बाहरी आँगन में स्थित राम चबूतरे पर उनके कब्ज़े को तो अदालत से पहले ही मान्यता मिल चुकी है और हाईकोर्ट की बहस में भी मुस्लिम समुदाय ने उनके इस दावे को माना है.

उनके अनुसार अब मुख्य विवाद बाबरी मस्जिद के तीनों गुम्बद के नीचे की ज़मीन को लेकर है, जहां छह दिसंबर को अस्थायी राम मंदिर बना दिया गया था. इसको हल करने के कई वैकल्पिक प्रस्ताव आए, लेकिन सहमति नही बन पाई.

निर्मोही अखाड़ा सूत्रों का कहना है कि लखनऊ और हैदराबाद के कुछ मुस्लिम नेताओं ने बातचीत को रुकवा दिया.

खंडन

बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति के संयोजक ज़फरयाब जिलानी कहते हैं कि अयोध्या के हिंदू-मुसलमान हमेशा आपस में मिलते रहते हैं, लेकिन उनकी जानकारी में कोई समझौता वार्ता नही हो रही थी.

जिलानी का यह भी कहना है कि जब तक संघ परिवार और विश्व हिंदू परिषद समझौता वार्ता में शामिल नहीं होते, तब तक कोई सार्थक परिणाम नही निकलेगा.

उनका कहना है, "निर्मोही अखाड़ा या एक पक्ष से बात करना बेकार है. असली पक्षधर संघ परिवार है. संघ परिवार भी कह रहा है कि इस वक्त बातचीत नहीं हो सकती. निर्मोही अखाड़ा वगैरह कोई महत्व नहीं रखते. उनसे बात करके विवाद खत्म नहीं होगा."

वे कहते हैं, "हम क्यों अपना समय बर्बाद करें. हमने निर्मोही अखाड़ा वालों से कह दिया है कि 24 सितंबर तक कोई बात मत कीजिए."

बातचीत की वकालत

निर्मोही अखाड़ा ने शुक्रवार को हाईकोर्ट से फ़ैसले की तारीख तीन दिन बढ़ाकर 27 सितंबर करने का अनुरोध किया था, जिसे अदालत ने नहीं माना.

अखाड़े के एक प्रमुख पंच महंत रामचंद्राचार्य का कहना है कि मामले अदालत के बाहर तय करने के लिए अब भी कोई देर नहीं हुई है.

उनका कहना है, "अभी भी राष्ट्रहित में इंसान होने के नाते इस देश के वासियों से मैं कहता हूँ कि समझौते की गुंजाइश है. यहाँ तक कि 24 सितंबर को हाई कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद भी बातचीत से मामले का हल हो सकता है, ताकि सुप्रीम कोर्ट में अपील की नौबत न आए."

बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति के संयोजक जिलानी भी कहते हैं कि हाई कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद बातचीत के रास्ते खुल सकते हैं.

दोनों पक्ष मानते हैं कि सार्थक बातचीत शुरू कराने के लिए भारत सरकार को पहल करनी होगी.

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