मुझसे परामर्श नहीं कियाः न्यायमूर्ति शर्मा

बाबरी मस्जिद

राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई कर रही तीन जजों की विशेष पीठ के जजों में संवादहीनता की स्थिति खुलकर सामने आ गई है.

फुल बेंच के तीसरे जज जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने कहा है कि बेंच के दोनों जजों ने शुक्रवार को इस मामले को बातचीत से हल करने संबंधी याचिका ख़ारिज करने का निर्णय देने से पहले उनसे परामर्श नहीं किया.

न्यायमूर्ति शर्मा ने इस फ़ैसले पर अपना अलग असहमति का आदेश सोमवार को दे दिया. जानकारों का कहना है कि जस्टिस शर्मा के असहमति के आदेश के बावजूद दोनों जजों का बहुमत का बहुमत का माना जाएगा और अब यदि सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नही करता तो 24 तारीख को फ़ैसला आ जाएगा.

इस आदेश में जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने याद दिलाया है कि 27 जुलाई को सुनवाई पूरी होने के बाद पूर्ण पीठ ने अपने आदेश में स्वयं कहा था कि मुक़दमे के पक्षकार इस बात के लिए स्वतंत्र हैं कि अगर मामले को समझौते से हल करने की कोई संभावना बनती है तो वे 24 सितम्बर को जजमेंट होने से पहले कभी भी अदालत के विशेष अधिकारी से संपर्क करके बेंच गठन का अनुरोध कर सकते हैं.

जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने कहा कि याचिकाकर्ता रमेश चंद्र त्रिपाठी के अलावा मुक़दमे का एक अन्य वादी निर्मोही अखाड़ा मामले को आपसी सहमति से तय करने के पक्ष में था.

उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट इस सम्बन्ध में याचिकाकर्ता की नीयत पर संदेह नही कर सकता. ऐसी स्थिति में रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका शरारतपूर्ण नही मानी जा सकती.

अधिकार नहीं है

न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा ने फ़ैसले में इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह मामला फैज़ाबाद ज़िला अदालत से सिविल प्रोसीजर कोड के तहत ट्रांसफ़र होकर आया था और यहाँ सुनवाई ट्रायल कोर्ट के रूप में हो रही न कि हाईकोर्ट के. इसलिए इस मामले की सुनवाई में हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका के व्यापक अधिकार हासिल नही हैं.

इससे पहले दोनों जजों जस्टिस एसयू ख़ान और जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने याचिका को शरारातपूर्ण मानते हुए पचास हज़ार रुपये का जुर्माना ठोंका था.

जस्टिस शर्मा ने कहा कि सिविल प्रोसीजर कोड की धारा 35 ए के तहत तीन हज़ार से अधिक काजुर्माना लगाया ही नहीं जा सकता.

उन्होंने अपने आदेश में कहा, "मुझे यह कहते हुए दुःख हो रहा है कि आदेश देते समय मुझसे परामर्श नही किया गया, अन्यथा मै अपने जज भाइयों को अपनी राय से अवगत कराता."

गंभीर टिप्पणी

कानून की दृष्टि से यह काफी गंभीर टिप्पणी मानी जा रही है. इससे पहले दोनों जजों ने अपने आदेश में जस्टिस शर्मा के बारे में बयान दिया था कि उन्होंने 13 सितंबर को अकेले ही रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका के बेंच के सामने सुनवाई का आदेश दे दिया.

अंत में जस्टिस शर्मा ने कहा कि मुक़दमे के पक्षकार सिविल प्रोसीजर कोड की धारा 89 के तहत फ़ैसले की तारीख से पहले मामले को आपसी सहमति से तय करने के लिए स्वतंत्र हैं.

इस बीच याचिकाकर्ता रमेश चंद्र त्रिपाठी ने कहा है कि उनके वकील इस मामले में फ़ैसले का समय बढ़ाने और केस को सहमति से हल करने का मौक़ा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.

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