दोबारा पेश होगी अयोध्या पर अपील

अयोध्या मामले पर फ़ैसले को टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई अपील पर गुरुवार को सुनवाई की संभावना है.

हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ ये अपील बुधवार को दाख़िल हुई थी लेकिन जिस बेंच के सामने इसका उल्लेख किया गया, उसने कहा कि यह उसके क्षेत्राधिकार से बाहर है इसलिए समझा जाता है कि अपील को अब दोबारा दूसरी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए रखा जाएगा.

सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश अल्तमस कबीर का कहना था कि इस याचिका पर सुनवाई उनके दायरे के बाहर है क्योंकि ये दीवानी मामला है और इसे दूसरे बेंच के सामने लिस्ट करना होगा.

अयोध्या में विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ संबंधी मुक़दमें का फ़ैसला टालने के लिए ये अपील एक प्रतिवादी रमेश चंद्र त्रिपाठी ने दाख़िल की है.

ये वही याचिका है जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था.

ग़ौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ इस संबंध में 24 सितंबर को अयोध्या-रामजन्मभूमि विवाद पर फ़ैसला सुनाने जा रहा है.

उसे रोकने के लिए ये याचिका रमेश चंद्र त्रिपाठी ने दायर की थी और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि सांप्रदायिक संवेदनशीलता और राष्ट्रमंडल खेलों को देखते हुए फ़ैसला टाल दिया जाए.

इसके पहले रमेश चंद्र त्रिपाठी ने हाईकोर्ट में भी ये याचिका दायर की थी लेकिन अदालत ने उसे ख़ारिज कर दिया था और याचिकाकर्ता पर 50 हज़ार रुपए का जुर्माना लगा दिया था.

हाई कोर्ट की राय

अदालत का कहना था कि मुक़दमे के चारों पक्ष में से जब कोई पक्ष बातचीत या समझौते के लिए तैयार नहीं है तो फ़ैसला टालने का कोई औचित्य नहीं बनता.

Image caption हाईकोर्ट को उस स्थान के मालिकाना हक़ पर फ़ैसला देना है जहां विवादित मस्जिद तोड़कर अस्थायी राम मंदिर बना दिया गया था

अदालत ने यह भी कहा कि एक बार फ़ैसले की तारीख तय होने के बाद मामले को टाला नहीं जा सकता.

1950 से चल रहे इस मुकदमें में चार मुख्य दावेदार हैं—सुन्नी वक्फ़ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा, राम जन्म भूमि न्यास और ( स्वर्गीय) गोपाल सिंह विशारद.

इन चारों के वकीलों का कहना था कि वे कोई समझौते की बात नही चला रहे हैं. केवल निर्मोही अखाड़ा ने फ़ैसले की तारीख़ तीन दिन बढ़ाकर 27 सितंबर करने की बात की थी.

ग़ौरतलब है कि हाईकोर्ट को उस स्थान के मालिकाना हक़ पर फैसला देना है जहां छह दिसंबर को विवादित मस्जिद तोड़कर अस्थायी राम मंदिर बना दिया गया था.

हिंदू महासभा के वकील हरिशंकर जैन के अनुसार मुख्य मुद्दा यही है कि क्या वहाँ पहले कोई मंदिर था?

अदालती इतिहास में यह न केवल 60 साल तक लंबा चलने वाला बल्कि एक ऐसा मुक़दमा है जिसमें दोनों पक्षों की भावनाएं जुड़ गई हैं.

अदालत के संभावित फ़ैसले को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें ज़रुरी सुरक्षा व्यवस्था कर रही हैं.

संबंधित समाचार