लोगों को रोज़ी-रोटी की चिंता

अयोध्या के मंदिर

फ़ैज़ाबाद-अयोध्या में इन दिनों एक चीज़ कॉमन है, जिससे सभी त्रस्त हैं, रोज़ी-रोटी जुटाने कि क़वायद. जहाँ भी नज़र जाती है हर तरफ़ उतरे हुए चेहरे दिखाई देते हैं.

दुकानें ख़ाली पड़ी हैं, बाज़ार वीरान हैं, मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या कम है. केवल स्थानीय लोग ही कर्फ्यू की आशंका में घर चलाने के लिए राशन जुटाने में लगे हुए हैं. ऐसे माहौल में कारोबार पर सबसे बुरा असर पड़ा है.

अयोध्या-फैज़ाबाद को धार्मिक नगरी माना जाता है. धर्म-कर्म के चलते यहाँ साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है.

फैज़ाबाद के चौक इलाक़े में कपड़े की दुकान करने वाले बाबू रंगीमल बताते हैं कि पिछले आठ दिनों से उनकी बोहनी तक नहीं हुई है.वे बताते हैं कि न कोई धोती ख़रीदने आ रहा है और न कोई चढ़ाने के लिए चुनरी.

सूने पड़े घाट

सरयू नदी के किनारे बसे अयोध्या के घाट साल भर स्नान के लिए आने वाले श्रद्धालुओं से आबाद रहते हैं. लेकिन ये क्या इन दिनों तो घाट पर न तो भक्त दिखते हैं और न नदी में विसर्जित किया जाने वाला चढ़ावा.

नदी के किनारे लाइन से बनी हुई छोटी-छोटी कुटियों में पुजारी-पंडे भोर से ही इस आस में पड़े रहते हैं कि श्रद्धालु आएँगे, सरयू में स्नान करेंगे, चढ़ावा-दक्षिणा देंगे और अपने घर को लौट जाएँगे. लेकिन उन्हें आजकल निराशा ही हाथ लग रही है.

इन पंडों में से एक राममूरत पांडेय बताते हैं कि पहले तो दिन में हज़ार-डेढ़ हज़ार तक कमा लेते थे.लेकिन आजकल तो सौ रुपए कमाना भी मुश्किल हो गया है.

कुछ ऐसा ही हाल हाल अन्य पंडों का भी है, न लोग स्नान करने आ रहे हैं और न फल-फूल चढ़ा रहे हैं.

वे बताते हैं कि कुछ स्थानीय लोग ही हैं जो रोज़ सुबह सरयू नदी में डुबकी लगाने की अपनी दिनचर्या को बनाए हुए हैं.

नम आँखों से राममूरत कहते हैं कि पूर्णमासी का दिन है और सुबह से बैठा हूँ कि किसी का उद्धार करा सकूँ!

बंदर भी भूखे

रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में शुक्रवार को फ़ैसला सुनाया जाने वाला था. इससे भक्तों ने अयोध्या से दूरी बना रखी हैं.

Image caption अयोध्या के बंदर आजकल दाने-दाने को मोहताज है.

इससे यहाँ के दुकानदारों और पंडों के साथ-साथ अयोध्या-फैज़ाबाद के बंदर भी बहुत परेशान हैं.

पहले का आलम यह था कि बंदरों को किसी भी तरह के प्रसाद खिलाना पुण्य का काम समझा जाता था.लेकिन जब भक्त ही नहीं आ रहे हैं तो ऐसे में इन सैकड़ों-हज़ारों बंदरों को खाना कौन खिलाएगा?

यही शिकायत अयोध्यावासियों की भी है. अयोध्या के किसी भी मंदिर की सीढियाँ उतरने पर श्रद्धालुओं को बंदरों से दो-चार होना पड़ता था.बंदरों को प्रसाद मिलने का इंतज़ार रहता था. पर आजकल इसकी संभावना कम हो गई है. ऐसे में ये बंदर आजकल इंसानों पर ही झपट्टा मारने की फ़िराक में रहते हैं.

एक पंडे ने मुझे बताया कि वह दिन दूर नहीं जब बंदर कूड़े के ढेर में खाना बीन कर खाएँगे.

पंडे की बात में दम भी लगा क्योंकि धर्म-कर्म के नाम पर चलने वाली अयोध्या नगरी में मंदिर-मस्जिद की राजनीति ने इंसानों और जानवरों के मुह से निवाला तक छीन लिया है!

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