कश्मीरः अलगाववादी हिंसा का असर

कश्मीर
Image caption कश्मीर घाटी में जारी हिंसा जम्मू के कश्मीरी पंडितों की ज़िदगी को प्रभावित कर रही है.

भारतीय राज्य जम्मू कश्मीर में जब मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में अलगावादी हिंसा भड़की तो इसके फलस्वरूप हज़ारों कश्मीरी हिन्दुओं को, जिन्हें कश्मीरी पंडित कहा जाता है वहाँ से अपने घर छोड़ कर पलायन करना पड़ा.

उस समय तीन लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों ने पलायन किया था और उनमें से अधिकतर जम्मू के आस पास शिविरों में बस गए.

तब से राज्य और केंद्र सरकार इन विस्थापितों को वापस घाटी ले जाने के प्रयासों में जुटी हैं ताकि वहां की मिश्रित संस्कृति बहाल हो जाए.

प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने इस दिशा में ठोस पहल करते हुए अप्रैल 2008 में एक पैकेज की घोषणा की थी जिसके तहत 6000 युवा विस्थापित कश्मीरी पंडितों को घाटी में सरकारी नौकरियाँ दिए जाने का प्रावधान था.

राज्य सरकार ने यह प्रक्रिया इस वर्ष मार्च में शुरू की थी और चुने गए उम्मीदवारों की पहली सूची जून में जारी करने का लक्ष्य रखा था.

लेकिन उस समय कश्मीर घाटी में आम नागरिकों का विरोध-प्रदर्शन और सुरक्षा बलों द्वारा जवाबी कार्रवाई ने हिंसा का सिलसिला शुरू कर दिया.

हिंसा का प्रभाव

इसने कई पहलुओं पर अपना प्रभाव छोड़ा.

विस्थापितों को नौकरियाँ देने की प्रक्रिया भी इसमें शामिल है.

जो लड़के और लड़कियाँ उस कश्मीर में वापस जाने के लिए उत्साहित थे जिसको उन्होंने बचपन में ही छोड़ दिया था, अब इस हिंसा के कारण वहाँ जाने के लिए एक बार फिर भय और संकोच से ग्रसित हो गए.

पूजा कौल केवल छ्ह वर्ष की थीं जब उन्हें घाटी में अनंतनाग के निकट अपना घर छोड़कर भागना पड़ा था.

उन्होंने बताया कि "मुझे बहुत ही ख़ुशी थी जब यह घोषणा हुई कि हम कश्मीर वापस जा सकते हैं और वहाँ नौकरी भी कर सकेगें. जब हमने फॉर्म भरा था तब वहाँ हालात सुधर रहे थे."

जम्मू कश्मीर सरकार युद्ध स्तर पर इन नौकरियों को भरने में जुटी थी. पहली सूची जून में निकालने का लक्ष्य था और धीरे-धीरे प्रक्रिया कुछ ही महीनों में समाप्त करने की बात हो रही थी.

लेकिन जून महीने में ही एक बार फिर कश्मीर घाटी में हालात ख़राब हो गए और सरकार असमंजस की स्थिति में पड़ गई.

कुछ समय टालमटोल के बाद हाल ही में पहली अस्थायी सूची सरकार ने जारी कर दी.

लेकिन जो उम्मीदवार पहले घाटी वापस जाने के लिए उत्सुक थे, अब दुविधा में पड़ गए.

माहौल

Image caption इस साल जून से कश्मीर में हिंसा का एक और नया दौर शुरू हुआ है.

मोनिका बट को कश्मीर में सरकारी अध्यापक चुना गया है लेकिन वो अभी वहाँ जाने के लिए तैयार नहीं हैं.

मोनिका कहती हैं, "इन हालात में तो वहाँ जाना बहुत मुश्किल है. जो वहाँ पहले काम करते थे वो भी भाग आए हैं तो हम कैसे जाएँ. वहाँ के लोग अपने बच्चों को पढ़ने बाहर भेज रहे हैं. इसलिए हम तभी जा सकते हैं जब माहौल ठीक हो जाएगा."

बिट्टू जी कौल जम्मू के निकट मुठी विस्थापित शिविर में रहते हैं. उनकी बेटी का नाम भी इस अस्थायी सूची में है.

उन्होंने हमें बताया, "सभी बच्चे कश्मीर वापस जाने के लिए बहुत खुश थे. मगर अब वहाँ हालात देख कर माता-पिता और ख़ुद बच्चे भी चिंतित हैं कि क्या करें. जहाँ तक मेरी व्यक्तिगत राय है तो मैं अपनी बेटी को अभी नहीं भेजूँगा. जब स्थिति सुधरेगी तभी भेजेंगे."

पहले सरकार ज़ोर देकर कह रही थी कि विस्थापितों को वापस ले जाने के लिए ज़ोर शोर से क़दम उठाए जा रहे हैं.

लेकिन अब तो राज्य के राहत और पुनर्वास मंत्री रमण भल्ला भी मानते हैं कि स्थिति अभी सही नहीं है.

उनका कहना है, "हम इन लोगों के साथ हैं जो मानते हैं कि स्थिति अभी ख़राब है. इस पैकेज को लागू करने के लिए अनुकूल वातावरण तलाश करना होगा."

कश्मीरी विस्थापितों को कश्मीर घाटी में नौकरियाँ देने को उनके वापस जाने की प्रक्रिया की शुरूआत माना जा रहा था.

विस्थापित मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर एएन साधू कहते हैं, "हर एक बच्चे के साथ अगर धीरे-धीरे घर के दो लोग भी जाते तो एक सिलसिला शुरू हो सकता था. लेकिन अगर हालात जल्द ठीक नहीं हुए तो कश्मीरी पंडितों की घाटी वापसी काफ़ी मुश्किल हो जाएगी."

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