अनिश्चितता की स्थिति नहीं चाहते हैं: सरकार

  • 28 सितंबर 2010

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या में विवादित स्थल के मालिकाना हक़ पर इलाहाबाद हाईकोर्ट अपना निर्णय सुनाए या नहीं, इस मामले में सुनवाई पूरी हो गई है और दोपहर बाद फ़ैसला सुनाया जाएगा.

वरिष्ठ पत्रकार राकेश भटनागर ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में एटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि सरकार किसी भी तरह की अनिश्चितता की स्थिति नहीं चाहती है.

वाहनवती का कहना था,'' हम समझौते का स्वागत करेंगें. लेकिन हम अनिश्चितता की स्थिति के पक्ष में नहीं हैं. हम सुप्रीम कोर्ट के 1984 के फ़ैसले से बंधे हुए हैं जिसके तहत विवादित स्थल को सरकार की देखरेख में दिया गया था. साथ ही सरकार से कहा गया था कि जिसके भी पक्ष में फ़ैसला होता है, सरकार ज़मीन उसके सुपुर्द कर, फ़ैसले को लागू करे.''

बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त ने जानकारी दी कि अखिल भारतीय हिंदू महासभा के चक्रपाणि महाराज ने बताया कि उनके वकील ने अदालत में कहा कि ये विवाद लंबे अर्से से चल रहा है और याचिकाकर्ता फ़ैसले में व्यवधान उत्पन्न करना चाहता है.

हिंदू महासभा ने अदालत को आश्वासन दिया कि हाई कोर्ट के फ़ैसले से कोई वैमनस्य उत्पन्न नहीं होगा.

ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया की अध्यक्षता में तीन जजों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई कर रही है.

इस पीठ में प्रधान न्यायाधीश के साथ ही न्यायमूर्ति आफ़ताब आलम और न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन भी हैं.

दरअसल रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक़ विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय 24 सितंबर को आना था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने रमेशचंद्र त्रिपाठी की याचिका के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी.

अयोध्या मुक़दमे के एक प्रतिवादी रमेश चंद्र त्रिपाठी की दलील है कि हाईकोर्ट का फ़ैसला टाल कर पक्षकारों को सुलह सफाई का मौक़ा दिया जाए.

उनकी दलील है कि अदालत में एक पक्ष की जीत से देश में हिंसा भड़क सकती है.

अगर सुप्रीम कोर्ट आगे की सुनवाई से इनकार कर देता है, तो इलाहाबाद हाईकोर्ट फ़ैसला सुनाने को स्वतंत्र होगा.

सुलह की संभावना कम

राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े लगभग अधिकांश पक्षों ने साफ़ कर दिया है कि अब मामले में आपसी बातचीत से सुलह की कोई गुंजाइश नहीं है.

Image caption अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था

अयोध्या विवाद से जुड़े इन पक्षों का मानना है कि हाईकोर्ट का फैसला पहली अक्टूबर को जस्टिस धर्मवीर शर्मा के रिटायर होने से पहले आ जाना चाहिए.

हाईकोर्ट ने इससे पहले 24 सितंबर को फ़ैसले की तारीख़ तय की थी और रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका रद्द कर दी थी, लेकिन त्रिपाठी ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी थी.

हालांकि मामले से जुड़ा एक पक्ष निर्मोही अखाड़ा फैसला टालने का पक्षधर है.

जबकि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड का कहना है कि अयोध्या विवाद पर फ़ैसला सुना दिया जाना चाहिए.

हिंदू महासभा, विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी पहले ही कह चुके हैं कि पहले कई बार की बातचीत बेनतीजा रही हैं इसलिए अब बातचीत में और समय बर्बाद न किया जाए.

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