'मायावती के कड़ी सुरक्षा के आदेश'

अयोध्या सुरक्षा
Image caption अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद से प्रदेश में सुरक्षा बलों को सतर्क कर दिया गया है.

गुरुवार को हाईकोर्ट में अयोध्या विवाद पर सुनाए जाने वाले फ़ैसले को देखते हुए उत्तर प्रदेश में व्यापक इंतज़ाम किए गए हैं और मायावती सरकार ने कड़ी सुरक्षा के आदेश दिए हैं.

राज्य सरकार ने हाईकोर्ट परिसर, अयोध्या और प्रदेश में अन्य संवेदनशील स्थानों पर सुरक्षा बालों को सतर्क कर दिया है.

उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा है, "सरकार किसी भी तरह से शांति का़यम रखने के बारे में प्रतिबंद्ध है. मुख्यमंत्री मायावती ने इस दृष्टि से 18 अगस्त को ही विस्तृत निर्देश दिए थे और कहा था कि इनका सख़्ती से पालन किया जाए."

उन्होंने कहा, "इस फ़ैसले के मद्देनज़र सुरक्षा की दृष्टि से पुख़्ता इंतज़ाम किए जाएँगे ताकि शरारती तत्व माहौल ख़राब न कर सकें. प्रदेश के सभी महत्वपूर्ण धार्मिक, ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा के बारे में सचेत रहा जाएगा और प्रदेश में अमन-चैन क़ायम रखा जाएगा."

पत्रकारों को आदेश की जानकारी तुरंत देने के लिए एक विशेष मीडिया सेंटर भी बनाया जा रहा है.

हाईकोर्ट के एक अधिकारी ने बताया है कि तीन जजों की पीठ अब 30 सितंबर गुरुवार को तीसरे पहर साढ़े तीन बजे अयोध्या के विवादित स्थल के स्वामित्व पर अपना फै़सला सुनाएगी.

सुप्रीम कोर्ट में रमेश चंद्र त्रिपाठी की अपील ख़ारिज होते ही पीठ ने आदेश की नई तारीख़ तय कर दी.

हाईकोर्ट को अयोध्या विवाद के चारों मामलों में कुल सौ से अधिक बिंदुओं पर अपना फै़सला देना है. इन सभी का केंद्र बिंदु 130 गुना 90 फीट की वो ज़मीन है , जिस पर विवादित मस्जिद के तीनों गुंबद खड़े थे और जिसे अनेक हिंदु भगवान राम का जन्म स्थान कहते हैं.

किन बिंदुओं पर फ़ैसला होगा

वर्ष 1949 में 22-23 दिसंबर को अयोध्या में कथित तौर पर चोरी छिपे भगवान राम और सीता की मूर्तियां रखने के बाद ज़िला प्रशासन ने विवादित इमारत को कुर्क कर लिया था.

कुर्की पर कार्यवाही की सुनवाई के दौरान ही जनवरी 1950 में भगवान सिंह विशारद की याचिका पर फैजा़बाद की एक सिविल कोर्ट ने मूर्तियों को हटाने पर रोक लगा दी थी.

कोर्ट ने विवादित परिसर के अंदर सीमित तौर पर पूजा अर्चना के लिए रिसीवर नियुक्त कर दिया था.

Image caption विवादित मस्जिद छह दिसंबर 1992 को उग्र कारसेवकों द्वारा तोड़ दी गयी थी.

इसके बाद 1959 में निर्मोही अखाड़ा , 1961 में सुन्नी वक्फ़ बोर्ड और 1979 में भगवान राम और जन्मस्थान की ओर से विश्व हिंदु परिषद के नेता देवकी नंदन अग्रवाल ने चौथा मुकदमा दायर किया. इन सब मुकदमों की एक साथ सुनवाई हो रही है.

साथ ही साथ फरवरी 1976 में विवादित परिसर का ताला खोलने के ज़िला जज के फै़सले के ख़िलाफ़ अपील पर भी जजमेंट देनी है.

अदालत को मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर फै़सला देना है कि क्या विवादित स्थल भगवान राम की जन्म भूमि है, क्या सन 1527 में कोई पुराना मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी और क्या इस्लामी का़नून के मुताबिक़ वो मस्जिद जायज़ है. क्या सन 1949, 22-23 दिसंबर को मस्जिद के अंदर चोरी छिपे मूर्तियां रख दी गई थीं अथवा वहां हमेशा से मूर्तियों की पूजा होती रही है?

कुछ तकनीकी बिंदुओं पर भी अदालत को निर्णय देना है. मसलन क्या ये मुकदमे निर्धारित समय सीमा में दायर किए गए, क्या मुकदमा करने वालों ने सरकार को ज़रुरी नोटिस वगै़रह दिए थे और क्या इस मामले में उन्हें मुकदमा दायर करने का का़नूनी अधिकार था?

हाईकोर्ट 1979 से इस मुक़दमे को ज़िला अदालत से अपने पास मंगाकर सिविल कोर्ट के रूप में सुनवाई कर रही है. हाईकोर्ट के फै़सले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील हो सकेगी. पक्षकार चाहें तो आपसी बातचीत भी शुरू कर सकते हैं.

पिछले 60 सालों में विवादित परिसर का भूगोल बिलकुल बदल गया है. विवादित मस्जिद छह दिसंबर 1992 को उग्र कारसेवकों द्वारा तोड़ दी गयी थी. इसके बाद केंद्र सरकार ने आसपास के मंदिरों आदि की जमीनों को मिलकर लगभग 70 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित कर ली थी , जिससे मूल विवाद पर अदालत का फ़ैसला लागू करने में आसानी हो.

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