क्या है हाई कोर्ट का फ़ैसला?

  • 1 अक्तूबर 2010
Image caption फ़ैसला काफ़ी कड़ी सुरक्षा के बीच सुनाया गया है.

हाई कोर्ट के तीन जजों ने अपने अपने फ़ैसले दिए हैं. तीनों जज यानी धर्मवीर शर्मा, एसयू खान और सुधीर अग्रवाल जिन बातों पर एकमत थे वो इस प्रकार हैं.

1. मस्जिद के अंदर के हिस्से में स्थित बीच का गुंबद तथा बाहरी परिसर में स्थित राम चबूतरा और सीता की रसोई हिंदू गुटों को दी जानी चाहिए.

2. गुंबद के अंदर मौजूद राम का जन्मस्थान और मूर्तियां को क़ानूनी व्यक्ति का दर्ज़ा दिया जाता है और ये ज़मीन भगवान की ही रहेगी और बाहरी हिस्सा सनातन धर्म ट्रस्ट के हिसाब से निर्मोही अखाड़े को.

3. दो जजों एसयू खान और सुधीर अग्रवाल का कहना था कि विवादित परिसर दोनों पक्षों के कब्ज़े में था इसलिए इसका एक तिहाई हिस्सा मुस्लिम सु्न्नी वक्फ़ बोर्ड को दिया जाए क्योंकि वो लंबे समय से मस्जिद का इस्तेमाल कर रहे थे.

4.कुल विवादित क्षेत्र 1500 वर्ग मीटर है. ये उस 70 एकड़ का हिस्सा है जिसे केंद्र सरकार ने 1993 में क़ानून पारित कर अधिगृहित किया था. बाद में इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगाई थी.

5. दो जजों ने यह सलाह दी कि सरकार के 70 एकड़ में से कुछ हिस्सा मुस्लिमों को दिया जाए क्योंकि मस्जिद के भीतरी परिसर के एक गुंबद के पास उनकी ज़मीन जाती है.

अदालत ने सभी पक्षों से सुझाव भी मांगा है कि ज़मीन का बंटवारा कैसे किया जाए.

अब तीनों जजों का फ़ैसला अलग अलग

जस्टिस धर्मवीर शर्मा का फ़ैसला

क्या विवादित क्षेत्र भगवान राम की जन्मभूमि है ?

विवादित क्षेत्र ही भगवान राम की जन्मभूमि है. जन्मस्थान पर क़ानूनी राय दी जा सकती है. यह ज़मीन भगवान राम के बचपन के रुप की दैवीय भावना को प्रदर्शित करता है.

वैसे भगवान तो कण कण में है और लोग अपने अपने हिसाब से जब चाहें उनका ध्यान कर सकते हैं. भगवान बिना किसी रुप के भी हो सकते हैं.

क्या विवादित ढांचा मस्जिद था? यह कब बना? किसने बनाया?

विवादित ढांचा बाबर ने बनाया था. कब बना इसके बारे में पुष्ट तारीख नहीं लेकिन यह इस्लाम के उसूलों के ख़िलाफ़ बनाया गया इसलिए इसे मस्जिद नहीं माना जा सकता.

क्या ये मस्जिद किसी हिंदू मंदिर को ढहा कर बनाई गई थी?

यह मस्जिद उस जगह पर बनाई गई जहां पहले एक ढांचा था जिसे तोड़ दिया गया और मस्जिद बनाई गई. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार पुराना ढांचा हिंदू धार्मिक ढांचा था.

क्या इस इमारत में 22 और 23 दिसंबर 1949 की रात मूर्तियां रखी गई थीं?

मूर्तियां 22 और 23 दिसंबर 1949 की रात में ही विवादित मस्जिद के बीच के गुंबद के नीचे रखी गई थीं.

विवादित क्षेत्र मसलन अंदरुनी और बाहरी परिसर की क्या स्थिति होगी?

अब ये स्थापित है कि जिस संपत्ति पर मामला दायर किया गया है वो रामचंद्र जी की जन्म भूमि है और उन्हें राम के चरण, सीता रसोई और अन्य पूजा स्थलों पर भी पूजा का अधिकार था और ये भी विवादित क्षेत्र में आते हैं. यह भी स्थापित हो चुका है कि हिंदू इस स्थान को राम के जन्म स्थान के रुप में मानते और पूजते रहे हैं और ये स्थान उनके लिए दैवी है और वो अनंत काल से इसे पवित्र मान कर इसकी तीर्थयात्रा करते रहे हैं. वहां विवादित ढांचा बनने के बाद यह स्पष्ट है कि मूर्तियां 22 और 23 दिसंबर 1949 की रात को वहां रखी गईं. यह भी पुष्ट हो चुका है कि बाहरी परिसर हिंदूओं के अधिकार में था और वो वहां पूजा करते रहे हैं. विवादित ढांचे के अंदरूनी हिस्से में भी हिंदू पूजा करते रहे हैं

यह भी स्पष्ट है कि विवादित ढांचे को मस्जिद नहीं माना जा सकता क्योंकि वो इस्लाम के उसूलों के ख़िलाफ़ बना है.

जस्टिस एसयू खान का फ़ैसला (मुख्य बातें)

ये साफ़ किया जाता है कि तीनों पक्षों को एक एक तिहाई ज़मीन दी जाए. मुख्य गुंबद के नीचे जहां राम की मूर्तियां हैं वो अंतिम फ़ैसले में हिंदूओं को मिलनी चाहिए.

जहां राम चबूतरा और सीता की रसोई है वो निर्माही अखाड़ा को मिलना चाहिए.

यह साफ़ किया जाता है कि तीनों पार्टियों को एक एक तिहाई मिले लेकिन जब ज़मीन बंटे तो छोटे मोटे समझौते किए जाएं और जिसे ज़मीन का जो नुकसान हो वो सरकार की अधिगृहित की गई ज़मीन में से पूरा कर लिया जाए.

इस क्षेत्र में अगले तीन महीने तक यथास्थिति बनी रहे.

जस्टिस सुधीर अग्रवाल का फ़ैसला(मुख्य बातें)

हिंदुओं की मान्यता के अनुसार विवादित ढांचे के मुख्य गुंबद के नीचे का क्षेत्र भगवान राम की जन्मभूमि है.

विवादित ढांचे को हमेशा मस्जिद के रुप में माना गया और मुसलमानों ने वहां इबादत की है. लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि मस्जिद बाबर के समय में 1528 में बनाई गई.

सबूतों और साक्ष्य के अभाव में यह बताना मुश्किल है कि यह विवादित ढांचा किसने और कब बनाया लेकिन ये साफ़ है कि यह ढांचा 1766 से 1771 के बीच जोसेफ टिफनथालर की यात्रा के दौरान वहां मौजूद था.

यह ढांचा किसी हिंदू मंदिर के टूटने के बाद बनाया गया था.

इस ढांचे के अंदर 22/23 दिसंबर 1949 की रात मूर्तियां रखी गईं.

बाकी दोनों मामले समयावधि के कारण खारिज किए जाते हैं.

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