भारतीयों को पहचान देने वाले नंबर मिलने लगे

  • 29 सितंबर 2010
Image caption इस परियोजना के तहत देश के हर नागरिक को विशिष्ट नंबर जारी किया जाएगा

हर भारतीय को पहचान पत्र और विशिष्ट पहचान नंबर देने की शुरुआत बुधवार को महाराष्ट्र के नंदूरबार ज़िले के तेंबली गांव से हुई है.

सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘आधार’ के तहत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने रंजना सोनवाने को 12 अंकों वाला पहला विशिष्ट पहचान नंबर (यूआईडी नंबर) दिया.

इस मौक़ पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा, "यूआईडी नंबर लोगों की सशक्त करने की दिशा में एक अहम क़दम है. हमारा लक्ष्य है कि विकास में सभी लोगों को शामिल किया जा सके और ऐसा पुराने विचारों और नीतियों से नहीं किया जा सकता."

सोनिया का कहना था कि सूचना का अधिकार, महात्मा गांधी नरेगा और शिक्षा का अधिकार जैसे कार्यक्रमों की तरह ही विकास को व्यापक और समुचित बनाने की दिशा में ये क़दम उठाया गया है. उनका कहना था कि इससे व्यवस्था पारदर्शी बनाई जा सकेगी ताकि सहायता सही लोगों तक पहुँच सके.

बीबीसी संवाददाता विनीत खरे के अनुसार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, "ये महत्वाकांक्षी योजना है और आधुनिक भारत का प्रतीक है और ये विभिन्न परियोजनाओं के लिए नींव की तरह काम करेगी. भारत तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है और इससे पहले इतने बड़े पैमाने पर दुनिया भर में कहीं भी इसका इतना व्यापक इस्तेमान नहीं हुआ है."

पहला चरण में 1.2 करोड़ कार्ड

पहले चरण में लगभग एक करोड़ 20 लाख लोगों को कार्ड उपलब्ध कराए जाएँगे. वर्ष 2014 तक 60 करोड़ लोगों को इसके दायरे में लाने की योजना है.

इस कार्ड का इस्तेमाल बैंक खाता खोलने, टेलिफ़ोन कनेक्शन लेने जैसे कामों में पहचान के तौर पर किया जा सकता है. देश के हर नागरिक को यूआईडी नंबर देने का ज़िम्मा इंफ़ोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में गठित भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) को सौंपा गया है.

यूआईडीएआई का गठन 2009 में किया गया था.

परियोजना का विरोध

सरकार की इस परियोजना का विरोध भी हो रहा है. अवकाशप्राप्त न्यायाधीश एपी शाह, इतिहासकार उमा चक्रवर्ती, सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे, फिल्मकार शोहिनी घोष ने यूआईडी परियोजना में निजता के हनन, पारदर्शिता की कमी और इसके व्यावसायीकरण की संभावना जताते हुए इसे तत्काल रोकने की माँग की है.

इस परियोजना के उद्देश्य पर आपत्ति जताते हुए 'कैंपेन फॉर नो यूआईडी' की शुरुआत हुई है.

इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने कहा कि नागरिकों को कोई नंबर देना और उनके फिंगरप्रिंट लेना दासता का प्रतीक है.

सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे का कहना है कि इस परियोजना में प्रौद्योगिकी क्षेत्र के कई विशेषज्ञ जुड़े हैं लेकिन ग्रामीण भारत की हकीकत भी पता होनी चाहिए.

उन्होंने यह भी कहा कि यूआईडी सीधे तौर पर आरटीआई का विरोधाभासी है.

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