कितना मज़बूत है 'आधार'?

  • 27 अक्तूबर 2010
Image caption बेघर लोगों से पहचान के किसी आधिकारिक दस्तावेज़ के बिना भी 'आधार' कार्ड दिया जाएगा.

'आधार' योजना के तहत हर भारतीय नागरिक को एक अलग नंबर के ज़रिए एक अलग पहचान दी जा रही है.

सरकार के मुताबिक 'आधार' की मदद से वो लोग भी मदद के हक़दार हो पाएंगे जो पहचान पत्रों के मोहताज हैं.

लेकिन राजधानी दिल्ली में रहने वाले कई लोगों का कहना है कि उनके पास पहले से कई और पहचान पत्र होने के बावजूद सरकारी योजनाओं के फायदे उन्हें अब भी नहीं मिलते.

पहचान पत्र की उपयोगिता

दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में एक बस्ती में कई सालों से रह रहे लोगों को करीब 6 महीने पहले ही एक पहचान पत्र, राशन कार्ड मिला.

लेकिन बस्ती में रहने वाले अजय कहते हैं कि, "पिछले 6 महीने में हमें सिर्फ एक बार राशन मिला है और मिट्टी का तेल तो मिला ही नहीं."

बस्तीवालों के मुताबिक अपनी अर्ज़ी लेकर वो कई अधिकारियों के पास जा चुके हैं, लेकिन हर महीने राशन मिलने का सपना तो सपना ही रह गया, और राशन की दुकान पर अक्सर ताला ही मिलता है.

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य और मज़दूर किसान शक्ति संगठन की संस्थापक, अरुणा राय के मुताबिक सरकार परेशानी की जड़ को नहीं समझना चाहती, इसलिए इलाज भी गलत दिशा में कर रही है.

वे कहती हैं कि, "एक और पहचान पत्र से कितना फायदा होगा? जब तक सरकारी तंत्र दुरुस्त नहीं होगा, सरकारी दफ्तरों में बाबू काम नहीं करेंगे, भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक सरकारी योजनाएं लागू नहीं होंगी." करोड़ों रुपए का खर्च

कई और मानवाधिकार कार्यकर्ता और स्वायत्त संगठन भी एक नए पहचान पत्र पर करोड़ों रुपए खर्च करने की उपयोगिता पर सवाल उठा रहे हैं.

'आधार' योजना लागू कर रही 'यूनीक आइडेन्टिफिकेशन एथॉरिटी ऑफ इंडिया' यानि 'यूआईडीएआई' के प्रबंध निदेशक आर एस शर्मा के मुताबिक इस योजना पर अब तक 3147 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं.

गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक योजना को पूरी तरह कार्यान्वित करने में 45,000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा.

सरकारी तंत्र की कमियों के मद्देनज़र, आर एस शर्मा ने भी ये माना कि एक नए पहचान पत्र का दिया जाना काफी नहीं है.

लेकिन 'आधार' योजना को बेहद उपयोगी बताते हुए उन्होंने कहा, "इस योजना से उन लोगों की पक्की पहचान हो जाएगी जो सरकारी योजनाओं के हकदार हैं, तो कम से कम सरकार का पैसा ज़रूरतमंद लोगों के पास तो जाएगा."

योजना का विरोध

'आधार' योजना के विरोध के कुछ और बिंदु भी हैं. ये कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि भारतीय नागरिकों के बारे में जुटाई जा रही इस जानकारी का गलत इस्तेमाल ना हो?

बायोमेट्रिक तकनीक इस्तेमाल करनेवाली इस योजना को ग्रामीण इलाकों में कार्यान्वित करना कितना सहज होगा?

कई देशों में ऐसी योजनाएं वापस लिए जाने के बावजूद इसे भारत में लागू क्यों किया जा रहा है?

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

आर एस शर्मा के मुताबिक 'आधार' योजना में सुरक्षा-संबंधी चिंताओं पर पूरा ध्यान दिया गया है और बायोमेट्रिक तकनीक का इस्तेमाल भी स्थिति को अनुकूल ही किया जाएगा.

साथ ही उनका मानना है कि जनसंख्या और विकास जैसे आयाम अलग होने की वजह से इस योजना की उपयोगिता को और देशों के तजुर्बे से जोड़कर देखना गलत होगा.

बेघर को मिलेगी पहचान

29 सितंबर को महाराष्ट्र में औपचारिक तौर पर पहला पहचान पत्र एक ग्रामीण महिला को देने के बाद अब राजधानी दिल्ली में भी पहचान पत्र देने के लिए सर्वेक्षण की प्रक्रिया शुरू हो गई है.

दिल्ली के एक रैन बसेरा में रहने वाले कुछ बेघर लोगों ने बीबीसी को बताया कि राशन कार्ड और चुनाव पहचान पत्र पाने के लिए उन्होंने बहुत कोशिश की, लेकिन पहले से पहचान साबित करने का कोई दस्तावेज़ नहीं होने की वजह से, उन्हें सफलता नहीं मिली.

ऐसे ही एक रैन बसेरे में रह रहे किशन लाल ने कहा, "इस बार जब 'आधार' के लोग आए तो अपनी पहचान साबित करने का कोई ज़रिया ना होने के बावजूद सर्वेक्षण करनेवालों ने हमारी जानकारी ली और वादा किया कि हमें भी एक पहचान पत्र मिलेगा. अब इससे उम्मीद है, उम्मीद तो नहीं छोड़ सकते."

हालांकि करीब 45 सालों से यहां रहे लोगों के मन में उम्मीद के साथ-साथ शंका भी है, क्योंकि सरकारी वादों को इन्होंने अक्सर पूरा होते नहीं देखा.

'आधार' योजना का काम इस वक्त भारत के 7 प्रदेशों में शुरू हो गया है और यूआईएडीआई के मुताबिक उनका लक्ष्य है, अगले 4 सालों में 60 करोड़ की जनता को पहचान पत्र दे पाना.

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