धार्मिक एकता की लखनवी तहज़ीब

  • 2 अक्तूबर 2010
Image caption लखनवी तहजीब हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है

लखनऊ शहर तीस सितंबर को मानो जैसे ठहर गया हो, बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि सहम सा गया. सन्नाटा पसर गया.

हमेशा गुलज़ार रहने वाली सड़कें वीरान हो गईं. गोया किसी बहुत बड़ी अनहोनी का अंदेशा हो. यह अयोध्या मसले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ द्वारा फ़ैसला सुनाए जाने का दिन था.

ऐसा नहीं कि लखनऊ में कभी कोई दंगा नहीं हुआ. अपने इस शहर में भी दंगे हुए हैं लेकिन केवल शिया और सुन्नी फ़िरक़ों के बीच, हिंदू और मुसलमानों के बीच कभी नहीं और शिया-सुन्नी फ़साद भी अब गुज़रे ज़माने की बात है- कम से कम तीन दशक पुरानी.

अब तो दोनों समुदायों के मौलाना अहम मौक़ों पर साथ खड़े नज़र आते हैं. रही बात हिंदुओं और मुसलमानों की तो उनके बीच ग़ज़ब के तालमेल का इतिहास रहा है और जो तमाम बदलावों के बावजूद आज तलक ज़िंदा है. यह लखनवी तहज़ीब की धुरी है.

शिवालय और मस्जिद

गर्व से बताना चाहूंगा कि लखनऊ में ख़ान साहेब का शिवालय बना और पाठक जी की मस्जिद भी. शहर का सबसे पुराना हनुमान मंदिर किसी मुस्लिम जागीरदार के दान से खड़ा हुआ था.

मोहर्रम में उठने वाला ताज़िया बनाने वाले पुश्तैनी कारीगर ज़्यादातर हिंदू हैं.

मोहर्रम के मौक़े पर यहां के किसी हिंदू शायर ने कभी फ़रमाया था कि ‘सुतवते तौहीद से गर मुसलमाँ हट जायेंगे/हिंदू होके मैं उठाऊंगा अलम अब्बास का.’ सुतवते तौहीद यानी एकेश्वरवाद.

पुराने लखनऊ में रमज़ान के दौरान रात ढलने पर लोगों का गाते-बजाते हुए गली-गली घूमने का रिवाज भी बहुत पुराना है- यह बताने के लिए कि उठो रोज़ेदारों, सहरी का समय हो चला है. यह अलग बात है कि अब ऐसी टोलियां इक्का-दुक्का नज़र आती हैं. यहां ख़ास बात इतनी कि यह टोलियां हिंदुओं की होती हैं.

'इंदर सभा'

Image caption लखनऊ की इमारतें वहां के शासकों के कला-संस्कृति प्रेमी होने का प्रमाण हैं

नवाब वाजिद अली शाह सबसे पहले संस्कृतिकर्मी थे. नवाब साहेब ने फ़ारसी में लिखे गए नाटक ‘इंदर सभा’ को खेलना तय किया, इसलिए उसका उर्दू अनुवाद हुआ. इंदर इसलिए कि फ़ारसी और उर्दू लिखावट में इंद्र इंदर हो जाता है.

‘इंदर सभा’ की कुल कहानी इतनी है कि इंद्र सभा की किसी नर्तकी को किसी सजीले राजकुमार से प्यार हो जाता है और वह उसे छिपा कर स्वर्ग ले जाती है. किसी दिन यह भेद खुल जाता है.

मामला इंद्र तक पहुंचता है और जहां उसे स्वर्ग से निकाल कर राजकुमार के साथ धरती पर भेज दिया जाता है- मोहब्बत जीत जाती है. उस राजकुमार की भूमिका नवाब साहेब ने अदा की थी.

नवाब साहेब पंजवक़्ता नमाज़ी ( पांचों समय नमाज़ पढ़ने वाले) थे. यह अलग बात है कि उन्होंने मंचन के लिए ‘इंदर सभा’ को चुना. कथक का कथानक हिंदू देवताओं ख़ास कर कृष्ण लीला पर आधारित होता रहा है और कथक नवाब साहेब के शरीर में बसता था.

इधर देश के तमाम हिस्सों ने लगातार अकाल झेला. दाने-दाने को लाले पड़ गए. पलायन का ग्राफ़ और ऊंचा हो गया.

नाकामी

लेकिन सरकारों ने क्या किया और किया तो कितना किया? देश में उस गोरी सरकार ने अकाल पीड़ित इलाक़ों के लिए फ़ैमीन कोड लागू किया था जिसने हमें ग़ुलाम बनाया था. लेकिन यह अकाल संहिता आज़ाद हिंदुस्तान में धूल फांकने के लिए छोड़ दी गई.

लखनऊ की मशहूर भूलभुलय्या को लोग कौतूहल से देखते हैं और हैरत में डाल देने वाली इस अनूठी इमारत की बनावट की तारीफ़ करते हैं. लेकिन कम लोगों को पता है कि अंग्रेज़ों के लागू किये गए फ़ैमीन कोड से बहुत पहले नवाब आसिफ़ुद्दौला बिना कोई नाम दिये अपना फ़ैमीन कोड लागू कर चुके थे. अकाल पड़ा, लोग भूख से तड़पने लगे.

नवाब साहेब अपनी रियाया को भीख नहीं दे सकते थे और उसे मरता भी नहीं छोड़ सकते थे. सो, उन्होंने फ़ौरन काम के बदले अनाज योजना लागू कर दी.

भूलभुलय्या इसी योजना का फल है. तभी तो अकाल पीड़ितों ने उन्हें मसीहा मान लिया और कहा कि ‘जिसको न दे मौला, उसको दे आसिफ़ुद्दौला’.

सबक

आज की सरकार बहादुरें क्या नवाब आसिफ़ुद्दौला से कोई सबक़ लेंगी, यह सवाल उठाना ख़ुद अपनी नादानी ज़ाहिर करना है. सरकार बहादुर तो खुद ही उन नीतियों और कार्यक्रमों को लागू कर रहे हैं, जो पहले से दुख-मुसीबत झेल रही जनता को और अधिक दुख-मुसीबतों से लाद देने का काम कर रही हैं. नाम विकास का है और काम विनाश का.

दुखियारी जनता की आवाज़ उन्हें सुनाई नहीं देती. उल्टे हक़ और इंसाफ़ मांग रहे अपने ही नागरिकों के खिलाफ़ बंदूक तानने और उन्हें देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बताने में कोई शर्म नहीं आती.

उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में, जिसमें लखनऊ भी शामिल है, अयोध्या है. अवध माने जहां किसी का वध न हो और अयोध्या माने जहां युद्ध न हो. लेकिन अयोध्या विवाद ने दोनों के अर्थ के साथ बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी की.

हिसाब नहीं कि इस विवाद में कितनों का वध हुआ और जिसने देश के बड़े हिस्से को बरसों तक हिंदू-मुसलमान के बीच युद्ध का मैदान बनाए रखा. आम ज़िंदगी के बुनियादी सवालों और ज़रूरी मसलों को पीछे रखने में यह विवाद ख़ूब काम आया.

नवाब वाजिद अली शाह क़लम के भी धनी थे. लल्लन पिया की ठुमरियां उन्हीं की देन हैं. अयोध्या विवाद के सिलसिले में उनका यह शेर बरबस याद आता है कि ‘हम इश्क़ के बंदे हैं, मज़हब से नहीं वाक़िफ़/गर काबा हो तो क्या, बुतख़ाना हो तो क्या.’

आख़िर में उन तुलसी दास ने जिन्होंने रामचरित मानस के ज़रिए राम को जन-जन तक पहुंचा दिया, कहा था कि मेरा क्या, दिन भर राम के गुन गाऊंगा और रात को मस्जिद की सीढ़ियों पर सो जाऊंगा.

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