सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी

  • 5 अक्तूबर 2010
ज़फ़रयाब जिलानी
Image caption ज़फ़रयाब जिलानी के मुताबिक अपील के तीन प्रमुख आधार होंगे.

अयोध्या विवाद पर हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद आपसी सुलह समझौते के पक्ष में प्रबल जनमत के बावजूद, मुकदमा लड़ने वाले प्रमुख मुस्लिम और हिंदू गुटों ने फैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने की बात कही है.

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा ने साफ़ कह दिया है कि वे सर्वोच्च अदालत जायेंगे, जबकि राम जन्म भूमि न्यास और विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता ‘राम जन्म भूमि के बंटवारे ‘ को तैयार नही हैं और वह भी कानूनी सलाह ले रहे हैं.

उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ़ बोर्ड एक वैधानिक संस्था है, जो सुन्नी मुस्लिम वक्फ़ संपत्तियों की मालिक है और उनके प्रबंध का कम करती है.

बोर्ड की बैठक लखनऊ में हुई. बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि अयोध्या मामले पर हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी.

बोर्ड के चेयरमैन ज़फर अहमद फारूकी के अनुसार बोर्ड ने यह भी साफ़ किया है कि उसने इस विवाद पर बातचीत के लिए किसी को अधिकृत नही किया है. उन्होंने कहा कि अगर मुक़दमे का कोई पक्षकार कोई प्रस्ताव देगा तो बोर्ड इस पर विचार करेगा.

बताते चलें कि इस समय सुन्नी वक्फ बोर्ड के लगभग सभी सदस्य सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी से संबद्ध हैं.

अब तक बोर्ड की ओर से हाईकोर्ट में पैरवी करने वाले वकील ज़फरयाब जिलानी ने बताया कि उन्होंने कई बिंदुओं पर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की सलाह दी है.

अपील के आधार

ज़फ़रयाब जिलानी का कहना था कि मुख्य रूप से उनकी अपील के तीन आधार हैं.

ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा, “एक तो हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में श्रद्धा और विश्वास को तरजीह दी है जो सबूत की श्रेणी में नहीं आता. सबसे बड़ा सवाल यही है. दूसरा ये कहा गया है कि ये स्थल हिंदू और मुसलमानों का साझा कब्ज़े वाला था जबकि बाबरी मस्जिद पर मुसलमानों का कब्ज़ा था और निर्मोही अखाड़े का बाहरी हिस्से पर. तीसरी बात ये कि वहाँ जुमे को ही नमाज पढ़ी जाती थी जबकि वहाँ पांचों वक्त नमाज होती थी.’

धार्मिक मामलों में मुसलमानों की सर्वोच्च संस्था ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ की एक बैठक 16 अक्तूबर को लखनऊ में होने वाली है. कई वरिष्ठ मुस्लिम नेता इस बात की कोशिश में लगे है कि हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद अयोध्या मसले को बातचीत से सुलझा लिया जाए.

Image caption मुक़दमे में भगवान राम के प्रतिनिधि त्रिलोकी नाथ पांडे कहते हैं कि वह जन्मभूमि का बंटवारा स्वीकार नही करेंगे

उधर हिंदुओं के रामानंदी सम्प्रदाय की धार्मिक पंचायती संस्था निर्मोही अखाड़ा के वकील रंजीत लाल वर्मा के बताया कि अखाड़े की बैठक जल्दी होने वाली है जिसमे सुप्रीम कोर्ट में अपील का औपचारिक निर्णय किया जाएगा.

वर्मा ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने जो फ़ैसला दिया है उसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर भी सुलह समझौते की गुंजाइश है.

हाईकोर्ट का फ़ैसला

हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में विवादित बाबरी मस्जिद के बाहरी आँगन में स्थित राम चबूतरे और सीता रसोई पर निर्मोही अखाड़ा का दीर्घकालीन कब्ज़ा मानते हुए उसे देने का निर्णय किया है. इसके अलावा मुख्य गुम्बद के नीचे की ज़मीन रामजन्म भूमि मानते हुए वहां विराजमान भगवान राम लला को देने का आदेश किया है.

कुल लगभग 1500 वर्ग मीटर विवादित भूखंड का एक तिहाई मुस्लिम पक्षकारों को देने का निर्णय हुआ, जिसमे सुन्नी वक्फ बोर्ड एवं अयोध्या के कुछ मुस्लिम नागरिक शामिल हैं.

मुक़दमे में भगवान राम के प्रतिनिधि त्रिलोकी नाथ पांडे कहते हैं कि वह समझौता वार्ता में शामिल होने को तैयार हैं, मगर जन्मभूमि का बंटवारा स्वीकार नही करेंगे.

त्रिलोकी नाथ पांडे कहते है, “मै इससे सहमत नही हूँ. यह इस देश में हमेशा के लिए झगडा और तनाव पैदा करना होगा. हम एक इंच ज़मीन नही देंगे ‘बाई हुक आर बाई क्रुक.’’

उनके अनुसार अभी उनके वकील मामले का अध्ययन कर रहे हैं.

पांडे राम मंदिर आंदोलन की अग्रणी संस्था विश्व हिंदू परिषद के नेता हैं और माना जाता है कि वह वही करेंगे जो विश्व हिंदू परिषद तय करेगी. मुक़दमे के प्रथम वादी राजेन्द्र सिंह का भी यही कहना है कि जैसा वकील कहेंगे वैसा करेंगे. सिंह का निर्णय भी विश्व हिंदू परिषद पर निर्भर करेगा.

हिंदू महा सभा पहले ही सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह चुकी है.

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