राजनीतिक सुविधा का गठबंधन

  • 16 अक्तूबर 2010
Image caption "इस गठबंधन में जो भाजपा के पास है वो नीतीश के पास नहीं और जो नीतीश के पास है वो भाजपा के पास नहीं."

जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की बुनियाद बहुत पुरानी नहीं है. इसकी जड़ें समाजवादी राजनीति में है.

समाजवादी राजनीति भी मूल रुप से ग़ैर-कांग्रेसी राजनीति के ईर्द-गिर्द घूमती है. अक्सर वोटों का बँटवारा रोकने के लिए सांप्रदायिकता का मुद्दा दरकिनार कर दिया गया.

जब आपातकाल के बाद केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी थी, उस समय भी यह भुला दिया गया था कि भारतीय जनता पार्टी (उस समय जनसंघ) कोई सांप्रदायिक पार्टी है.

जब नीतीश कुमार लालू प्रसाद से अलग हुए तो उन्होंने 1977 की थीम पर ही भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया.

इस गठबंधन की नींव 1998 में पड़ी थी जब मुंबई में हुए भाजपा के महाधिवेशन में लालकृष्ण आडवाणी ने नीतीश कुमार को बुलवाया और वहाँ नीतीश कुमार ने भाषण भी दिया था.

आडवाणी और पार्टी के दूसरे दूरदर्शी नेता देख रहे थे कि नीतीश के साथ बड़ा जनाधार है और भाजपा अपनी नैया उनके सहारे पार उतार सकती है.

भाजपा के दो मुद्दे थे जिस पर जनता दल यूनाइटेड को आपत्ति थी, एक तो अयोध्या का और दूसरा कश्मीर में धारा 370 का. लेकिन भाजपा ने मान लिया था कि वह इन्हें हाशिए पर रखेगी.

जब नीतीश कुमार लालू प्रसाद यादव से अलग हुए थे तो उनके पास कोई राजनीतिक पार्टी नहीं थी. लेकिन बाद में जनता दल का दो हिस्सों में विभाजन हुआ. एक हिस्सा राष्ट्रीय जनता दल बना और दूसरा जनता दल यूनाइटेड.

नीतीश के पास कुर्मी-कोइरी आदि पिछड़े वर्ग का वोट था और वो अभिजात्य वर्ग था जो लालू प्रसाद यादव के रुखेपन और उनकी कार्यशैली से नाराज़ था.

Image caption "शरद यादव जैसे नेताओं को केंद्र में रखना नीतीश की राजनीति का हिस्सा है"

जॉर्ज फ़र्नांडिस और शरद यादव जैसे नेता भी लालू प्रसाद से नाराज़ थे और वे भी नीतीश के साथ आ गए.

सुविधा का गठबंधन

किसी और गठबंधन की तरह ही यह राजनीतिक सुविधा का ही गठबंधन है. इस गठबंधन में जो भाजपा के पास है वह नीतीश के पास नहीं है और जो नीतीश के पास है वह भाजपा के पास नहीं है.

नीतीश के पास मुसलमानों का समर्थन है. ये वो मुसलमान हैं जो लालू और कांग्रेस से छूटे हुए नरमपंथी मुसलमान हैं. इसी के दम पर वे अपने विधायक सांसदों को जिता लेते हैं. यहाँ तक कि वे भाजपा के नेता शहनवाज़ को भी जिता लेते हैं.

दूसरी ओर भाजपा के पास कट्टर हिंदूवादियों और व्यावसायी वर्ग का समर्थन है जो नीतीश के पास नहीं है.

कुल मिलाकर दोनों ने मिलकर एक ऐसा गठबंधन बनाया जिसमें एक से छूटा हुआ दूसरे को मिल जाता है.

इस गठबंधन में जहाँ तक समझौते का सवाल है तो इसमें भाजपा ही ज़्यादा समझौते करती रही है क्योंकि उसके पास नीतीश जैसा वोट बैंक या कहें कि जातिगत आधार नहीं है. दूसरे, नीतीश का राजनीतिक व्यक्तित्व बहुत बड़ा है और भाजपा के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो उसकी बराबरी कर सके.

नीतीश का व्यक्तित्व

यह दिलचस्प सवाल है कि ऐसा क्यों है कि जब नीतीश का व्यक्तित्व इतना बड़ा है तो कभी उन्हें जॉर्ज फ़र्नांडिस की ज़रुरत पड़ती है और कभी शरद यादव की.

मुझे लगता है कि यह नीतीश की रणनीति का हिस्सा है. ये जितने बड़े नेता हैं, जिनके पास एक उर्वर मस्तिष्क है, उन्हें नीतीश ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व के लिए रखा है.

इन बड़े नेताओं का राजनीतिक आधार नीतीश जितना बड़ा नहीं है इसलिए आप पाएंगे कि वे आख़िर में केयर ऑफ़ नीतीश ही हैं. इसे नीतीश की समझदारी कहें या राजनीति की भाषा में चालाकी, लेकिन नीतीश जानते हैं कि ये नेता अगर ख़ाली हुए तो उनके लिए बाधा पैदा कर सकते हैं. जॉर्ज और शरद राजनीतिक रुप से जितने प्रखर हैं, उनकी नकारात्मक आवाज़ का भी बहुत वज़न है.

जॉर्ज या शरद दिल्ली में रहकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के संयोजक हो सकते हैं. नीतीश ये नहीं कर सकते. अगर वे ऐसा करने लगेंगे तो राज्य की राजनीति पीछे छूट जाएगी. वे चंद्राबाबू नायडू या जयललिता वाली राजनीति नहीं करना चाहते थे क्योंकि आख़िरकार उन नेताओं को इसका नुक़सान ही हुआ.

इसलिए नीतीश रामसुंदर दास जैसे क़द्दावर दलित नेता को लोकसभा का चुनाव जितवाते हैं और फिर सदन में संसदीय दल के नेता बनाते हैं. इससे वे एक बड़े नेता को व्यस्त भी करते हैं और यह संदेश भी देते हैं कि वे दलितों को साथ लेकर चल रहे हैं.

दूसरी ओर भाजपा में सुशील कुमार मोदी ज़रुर उसी छात्र आंदोलन से आए हैं जिससे नीतीश, लालू और पासवान आए हैं लेकिन उनका व्यक्तित्व उतना बड़ा नहीं है. वे एक शांत हैं और उनमें नीतीश जैसी राजनीतिक धार नहीं है.

Image caption बिहार की राजनीतिक ज़मीन ऐसी है जहां हर पार्टी एक दूसरे के घर में सेंध मार सकती है.

भाजपा में राजीव प्रताप रुडी एक तेज़तर्रार नेता दिखते हैं और ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में भाजपा ज़रुर उन्हें राज्य में आगे बढ़ाएगी. रविशंकर प्रसाद जैसे नेताओं की दिलचस्पी राज्य की बजाय केंद्र की राजनीति में दिखती है.

राजनीतिक ज़मीन

जहाँ तक राजनीतिक ज़मीन का प्रश्न है तो इस गठबंधन ने इतनी मज़बूत और बड़ी राजनीतिक ज़मीन तैयार नहीं की है कि वे यह दावा कर सकें कि वे इन चुनावों में दो तिहाई बहुमत से या भारी बहुमत से जीत जाएँगे.

अभी भी वहाँ बराबरी की लड़ाई दिखती है और राष्ट्रीय जनता दल-लोकजनशक्ति पार्टी का गठबंधन भी बराबरी की लडा़ई लड़ रहा है. फिर एक ओर कांग्रेस भी है.

भाजपा के अलावा राज्य में जिसकी भी राजनीतिक ज़मीन है वह ऐसी है कि कोई दूसरा उसमें सेंध मार सकता है.

नीतीश की ज़मीन को कांग्रेस साझा कर सकती है तो कांग्रेस के वोटों पर लालू की भी नज़रे हैं. लालू की ज़मीन पर पासवान भी साझीदार दिखते हैं तो पासवान के मतदाता नीतीश से भी प्रभावित हो सकते हैं.

चूंकि किसी की भी ज़मीन ठोस नहीं हैं इसलिए किसी के भी आत्मविश्वास का स्तर बहुत ऊँचा नहीं है.

कुल मिलाकर कहें कि उत्तर प्रदेश में जो मायावती ने किया वह नीतीश बिहार में करने की स्थिति में नहीं हैं, तो ग़लत नहीं होगा.

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