आंध्र में माईक्रो फाइनांस के लिए क़ानून

क़र्ज़
Image caption ग्रामीण छोटे मोटे धंधों के लिए माईक्रो फाइनांस कंपनियों से ऊँचे ब्याज पर क़र्ज़ लेते हैं

महज़ साल भर के दौरान राज्य में हुई दर्जनों आत्महत्याओं के मद्देनज़र आंध्र प्रदेश सरकार ने माईक्रो फाइनांस कंपनियों के काम काज पर गुरूवार को एक अध्यादेश जारी किया है.

राज्य मंत्रीमंडल की एक आपातकालीन बैठक में पास किए गए इस अध्यादेश में ऋण की वसूली के लिए लोगो को परेशान करने और उन्हें डराने धमकाने पर तीन वर्ष क़ैद और एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है.

साथ ही छोटे क़र्ज़ देने वाली इन माईक्रो फाइनांस कंपनियों के लिए रजिस्ट्रेशन करवाना ज़रुरी कर दिया गया है जिसका सालाना नवीनीकरण भी किया जाएगा.

अध्यादेश को राज्यपाल ई एस एल नरसिम्हन की मंजूरी के लिए भेज दिया गया है.

आत्महत्या

राज्य प्रशासन के अपने आंकड़ों के अनुसार पिछले एक साल के भीतर क़र्ज़ लेनेवाले कम से कम 30 ग्रामीणों ने इन कंपनियों के उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या कर ली है.

पिछले केवल दो महीनों में राज्य के आठ ज़िलों में 17 लोगों की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं इनमें अधिकतर महिलाएं थीं.

इनके परिवारों का आरोप है कि र्कज़ देने वाली कंपनियाँ ऋण की वापसी के लिए उन्हें डरा धमका रही थीं और उनका अपमान कर रहीं थीं.

अक्टूबर में विशाखापटनम जिले में फाइनांस कंपनी की वसूली करने बाले कुछ लोंगो ने एक महिला की दस साल की बेटी को उठा लिया था जिसकी

रिहाई के लिए पुलिस को करवाई करनी पड़ी.

इस तरह की कई घटनाओं के कारण राज्य भर में इन कंपनियों के ख़िलाफ एक माहौल तैयार हो गया था.

वारंगल और खम्माम जिलों में लोगों ने ऐसी चंद कंपनियों के कार्यालयों पर हमले कर तोड़ फोड़ भी मचाई थी.

माईक्रो फाइनांस कंपनी

उल्लेखनीय है कि माईक्रो फाइनांस कंपनियाँ रिर्ज़व बैंक ऑफ़ इंडिया की अनुमति से स्थापित की जाती हैं ताकि ग्रामीण इलाक़े के ग़रीब लोगों को ऋण उपलब्ध हो सके.

आंध्र प्रदेश में ऐसी कंपनियाँ दुसरे राज्यों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा हैं जिन्होंने गत दस वर्षों के दौरान 66 लाख लोगों को 5,000 करोड़ रुपये र्कज़ दिए हैं.

तेलगू देसम सांसद म्य्सूरा रेड्डी का कहना है कि चूँकि यह कंपनियाँ खुद बड़े बैकों से र्कज लेकर धंधा करती हैं इसलिए इनका सालाना ब्याज दर बहुत ऊँचा होता है - 30 से 50 प्रतिशत तक.

प्रजा राज्यम पार्टी के नेता रामाचंद्रैः का कहना है कि इन कंपनियों की उपस्थिति ग्रामीण इलाकों में ज़रुरी है मगर उनपर सख्त निगरानी की ज़रूरत है.

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