येदुरप्पा ने ख़ुद को दोबारा साबित किया

  • 14 अक्तूबर 2010
येदुरप्पा
Image caption येदुरप्पा का कहना है कि वो दोबारा भी विश्वास मत हासिल कर लेंगे

कर्नाटक के भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने गुरुवार को दोबारा विश्वास मत हासिल कर लिया है.

राज्यपाल हंसराज भारद्वाज के निर्देश के बाद चार दिनों में वो दूसरी बार विधानसभा में बहुमत हासिल करने का प्रयास कर रहे थे.

राज्य विधानसभा में इस बार उन्हें कुल 106 विधायकों का समर्थन हासिल हुआ.

इससे पहले 11 अक्तूबर को वॉयस वोट यानि ध्वनि मत से मतदान हुआ था, साथ ही बाग़ी विधायकों को मतदान में हिस्सा नहीं लेने दिया गया था जिसके कारण राज्यपाल ने इसे मानने से इनकार कर दिया था.

राज्यपाल का कहना था कि इससे भाजपा सरकार का बहुमत साबित नहीं होता है.

इस विश्वास मत के दौरान विधानसभा में भारी हंगामा हुआ था और निलंबित विधायकों का मार्शल की मदद से बाहर निकाला गया था.

हालांकि येदिरप्पा ने राज्यपाल के इस फ़ैसले के बारे में कहा था कि वो इससे नाखुश हैं. लेकिन वो गुरुवार को दोबारा बहुमत साबित करने पर सहमत हो गए थे.

मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने उम्मीद ज़ाहिर की थी कि वो ये विश्वास मत भी जीतेंगे.

टकराव

भाजपा और राज्यपाल के बीच टकराव की मुख्य वजह यह थी कि राज्यपाल ने विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दिया था कि वो 11 बाग़ी भाजपा विधायकों और पाँच सरकार विरोधी निर्दलीय विधायकों को अयोग्य घोषित करने की कोशिश न करें.

बहरहाल विधानसभा अध्यक्ष ने उनका सुझाव ठुकरा कर मतदान करवाया था.

इस बीच बुधवार को दिल्ली में भारतीय के वरिष्ठ नेताओं ने कर्नाटक के मसले पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी चिदंबरम से मुलाक़ात कर कहा है कि राज्यपाल हंसराज भारद्वाज को वापस बुलाया जाए क्योंकि वो राज्य सरकार के कामकाज में सीधा दख़ल दे रहे हैं.

दूसरी ओर निर्दलीय विधायकों ने बंगलौर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा कर अपील की थी कि गुरुवार को होने वाले विश्वासमत में उन्हें हिस्सा लेने दिया जाए.

हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम फ़ैसले में कहा कि गुरुवार को होने वाला विश्वासमत निर्णायक नहीं होगा बल्कि वो अदालत के 18 अक्तूबर को आने वाले फ़ैसले पर निर्भर होगा.

जानकारों का कहना है कि अगर बंगलौर हाई कोर्ट विधानसभा अध्यक्ष के 11 बाग़ी भाजपा विधायकों और पांच निर्दलीय विधायकों को दलबदल क़ानून के तहत अयोग्य क़रार देने के फ़ैसले को ग़लत ठहराता है तो फिर तीसरी बार विश्वासमत कराने की ज़रूरत पड़ सकती है.

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