बदला-बदला सा है अब नज़ारा

जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम
Image caption खेलों के लिए लाए गए साज़ो-सामान को गाड़ियों में भर कर बाहर भेजा जा रहा था.

ग्यारह दिन तक भारत की राजधानी दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के रंग में रंगी रही.

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था, चारों तरफ खेलों से जुड़े पोस्टर, बिलबोर्ड दुल्हन की तरह सजी दिल्ली को देखकर लगता था जैसे पूरा शहर रंगबिरंगी रोशनी में नहा गया हो.

खेल देखने के लिए मेट्रो स्टेशन पर लोगों की भीड़ उमड़ती रही और खेल स्थलों के बाहर-भीतर राष्ट्रमंडल खेलों को कामयाब बनाने में हज़ारों स्वयंसेवक जुटे रहे.

सबके दिलों में एक ही जज्बा था कि खेलों को कामयाब बनाना है, लेकिन खेलों के समापन समारोह के एक दिन बाद खेल गतिविधियों का केंद्र रहा जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम कैसा नजर आ रहा है ये देखने के लिए मैं जब वहां पहुंचा तो नज़ारा बिल्कुल बदला-बदला था.

सूनसान

Image caption जिस स्टेडियम को सजाने के लिए मजदूरों ने दिन-रात एक कर दिया था वही आज उसे तोड़ने में जुटे थे.

गुरुवार तक सुरक्षाकर्मियों, खिलाड़ियों, स्वयंसेवकों और दर्शकों से भरा स्डेडियम आज बिल्कुल सूनसान पड़ा था.

दिनरात स्टेडियम के चप्पे-चप्पे की निगरानी करनेवाले सुरक्षाकर्मी शुक्रवार को थोड़े आराम की मुद्रा में नजर आए.

कुछ सुरक्षाकर्मी अलसाए से झुंड बनाकर बैठे थे कुछ गप्प करते और कुछ पेपर पढ़ते नज़र आए.

सशस्त्र सीमा सुरक्षा बल के जवान राकेश कहते हैं, ''कॉमनवेल्थ गेम्स खत्म हो गए, थोड़ा आराम महसूस हो रहा है. ऐसा लग रहा है सिर का बोझ कम हो गया हो.''

जब मैं सुरक्षाकर्मियों के बीच से निकलकर स्टेडियम के भीतर पहुंचा तो देखा कि जिस स्टेडियम को सजाने के लिए मजदूरों ने दिन-रात एक कर दिया था वही आज उसे तोड़ने में जुटे थे.

सैकड़ों की संख्या में देशी-विदेशी मजदूर स्टेडियम में लगी लाइट्स, फ्रेम्स, को निकालने में लगे थे, जो चीजें निकाली जा चुकी थीं उन्हें गाड़ियों में भर कर बाहर भेजा जा रहा था.

उजड़ा-उजड़ा

Image caption सुंदरता में नहाया स्टेडियम आज उजड़ा-उजड़ा सा नज़र आ रहा था.

गुरुवार तक सुंदरता में नहाया स्टेडियम आज उजड़ा-उजड़ा सा नज़र आ रहा था.

मैंने वहां काम कर रहे कुछ मजदूरों से पूछा कि उन्हें आज कैसा महसूस हो रहा है तो उन्होंने कहा, ''महीनों लगे थे स्टेडियम को सजाने में, आज तोड़ते हुए बहुत बुरा लग रहा है. सब कुछ सूना-सूना लग रहा है. जो रौनक थी वो अब एकदम खत्म हो गई है.''

ये मज़दूर राष्ट्रमंडल खेल की यादों को हमेशा के लिए संजो कर रखना चाहते हैं.

एक ने कहा, ''अपने बच्चों के बीच बैठकर कॉमनवेल्थ खेलों की रिकॉर्डिंग देखेंगे. उन्हें बताएंगे कि हमने इन खेलों की तैयारी में नेहरू स्टेडियम में काम किया था. काफी एन्जॉय किया था, काफी खुश हुए थे.''

नए काम की तलाश

Image caption मजदूरों को अब रोज़ी रोटी के लिए नए सिरे से जद्दोजहद करनी होगी.

खेलों का मेला खत्म हो गया है. आयोजन से जुड़े सभी लोग आराम की मुद्रा में हैं, लेकिन ज़्यादातर मज़दूरों को अब ये चिंता सताने लगी है कि महीनों आराम से रोज़गार की जो सहूलियत थी वो अब ख़त्म हो गई है. अब फिर काम की तलाश में भटकना होगा.

उनका कहना है, यहां तो काम खत्म हो गया है, दो महीने से रोज़गार मिला हुआ था, अब नए काम की तलाश करनी पड़ेगी.

मजदूरों की चिंता वाजिब है. हजारों की संख्या में दिल्ली में डेरा डाले प्रवासी मजदूरों को अब रोज़ी रोटी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ेगी.

हालांकि उनके दिलों में ये खुशनुमा एहसास भी है कि सीमित समय में खेलों को कामयाब बनाने के सपने को उन्होंने अपनी दिनरात की मेहनत से साकार कर दिया.

भले ही तारीफों और बधाइयों के नशे में डूबी सरकार और आयोजन समिति को उनका ये योगदान ज़्यादा समय तक याद न रहे.

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