अब राजस्थान में भी गरबा और डांडिया

  • 15 अक्तूबर 2010
गरबा

भारत में गरबा और डांडिया गुजरात की सांस्कृतिक पहचान हैं. लेकिन अब ये नृत्य विधाएं तेजी से गुजरात के बाहर भी जगह बना रही हैं.

पिछले कुछ वर्षों में इन नृत्यों ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में अपनी चाहत पैदा कर दी है.

गुजरात के बाहर इन नृत्यों के आयोजक कहते हैं कि गरबा और डांडिया बहुत मनभावन नृत्य हैं. लेकिन कुछ समाज विज्ञानी इसके विस्तार में बाज़ार का भी योगदान मानते हैं. राजस्थान में कम समय में ही इन दोनों नृत्यों ने घूमर जैसे नृत्य की ही तरह अपना स्थान बना लिया है.

कोई एक दशक पहले गरबा और डांडिया राजस्थान में मेहमान की भांति दाखिल हुए. अब वो राजस्थान के कई शहर-कस्बों में नवरात्र और दीवाली के स्थाई आकर्षण बन गए हैं.

इन नृत्यों ने नई पीढ़ी का मन मोह लिया है इसलिए रंग-मंडपों पर देर रात तक लोग डांडिया की धुनों पर थिरकते रहते हैं.

पिछले कई वर्षों से जयपुर में इस नृत्य आयोजन में लगी अभिव्यक्ति संस्था की भावना भार्गव कहती हैं, "दरअसल हमने लोगों को ये समझाया कि गरबा होता क्या है और ये कैसे खेला जाता है. राजस्थान में इसका ज़्यादा प्रचलन नहीं था क्योंकि राजस्थान के अपने नृत्य हैं. जब हमने लोगों को शिविर लगा कर सिखाना शुरू किया तो लोगों में एकदम से रुझान बढ़ा."

बढ़ता प्रचलन

भावना भार्गव कहती हैं, "अब लोग इसे ठीक से समझ गए हैं. उन्हें यह पसंद आने लगा है. लोगों में कुछ नया सीखने का जज्बा हमेशा होता है. वैसे कालबेलिया, घूमर, गैर और गोरबंद जैसे नृत्य तो इस माटी के हैं. लोगों को लगा कि कुछ और भी सीखना चाहिए तो इसमें गरबा बाज़ी मार गया."

जयपुर में कई स्थानों और संस्थाओं में गरबा के आयोजन होने लगे हैं. इसमें युवा पीढ़ी बढ़-चढ़कर भाग ले रही है. जयुपर में धर्मेंद्र और दीपक जैसे कई युवक हैं जो गरबा नृत्य सीख चुके हैं.

धर्मेन्द्र खंडेलवाल कहते हैं, "गरबा में एक कशिश है. इन दिनों जो मजा गरबा में आता है वो मुझे किसी भी और नृत्य में नहीं आता. चिरमी और घूमर महिलाओं के लिए ज़्यादा हैं. गरबा में दोनों समाहित हैं."

अहमदाबाद के जय ऐसे समूह के सदस्य हैं जिसमें दो सौ लोग हैं. उन्हें गरबा और डांडिया सिखाने के लिए देश विदेश में जाने का मौक़ा मिला है.

जय कहते हैं, "मध्य प्रदेश में लगभग हम हर अंचल में पहुंचे और गरबा सिखाया, अब राजस्थान में आने लगे हैं. भारत क्या हम तो विदेशों में कई देशों में गरबा सिखा चुके हैं. दिन प्रतिदिन इसकी मांग बढ़ रही. ये भक्ति भाव का हिस्सा है."

राजस्थान की अपनी भी मनभावन नृत्य विधाएं हैं. मगर अब गरबा और डांडिया राजस्थान के उत्सव मंचों के नए अवतार हैं.

जयपुर के के सी मालू ने रेगिस्तान के गीत संगीत को बहुत प्रचारित किया है. उन्होंने कुछ साल पहले घूमर नृत्य को गरबा और डंडिया की तरह ऐसे ही प्रचारित करने का प्रयास किया था लेकिन कामयाबी नहीं मिली.

फैशन

मालू कहते हैं, "दरअसल गरबा और डांडिया फैशन का हिस्सा हो गए हैं. इसमें एक खुलापन भी है. जो आज युवा पीढ़ी भी चाहती है. घूमर महिलाओं के लिए ज़्यादा है. फिर घूमर में मंच ढका रहता है. हमें भी अब परिवर्तन करना होगा क्योंकि वो गुजरा जमाना था जब मुंह ढका रहता था. फिर सरकार ने हमारे नृत्यों को ऐसे प्रोत्साहित नहीं किया जैसे गुजरात ने गरबा और डांडिया को बढ़ाया है."

समाज विज्ञानी डॉ राजीव गुप्ता कहते हैं, "गरबा, डांडिया और भांगड़ा ऐसे नृत्य हैं जिसमें सामूहिकता का भाव है. आज के दौर में जब लोग एकाकी होने लगे हैं तो उन्हें ऐसे नृत्य आयोजन में शिरकत करना सुकून देता है. उन्हें लगता है वो भी एक सामूहिकता का हिस्सा हैं. हाँ, इस सांस्कृतिक बदलाव को बाजार की शक्तियों ने इस्तेमाल किया है."

वो कहते हैं, "खास कर कारोबारी समूहों को लगता है कि वो ऐसे आयोजनों के जरिए एक साथ बहुत लोगों के बीच पहुँच सकते हैं, उनका उत्पाद एक साथ कई लोगों के पास जा सकता है. फिर डंडिया और गरबा में लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की ताकत भी है."

दुनिया में नृत्य कहीं भी हो, उसमें पैरों की थिरकन बहुत अहम होती है. इसीलिए जब इन नृत्यों ने गुजरात से अपनी यात्रा शुरू की तो थिरकते कदमों का साथ था. मगर उसे ज़्यादा गति तब मिली जब बाजार ने भी उसका हाथ थाम लिया.

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