राजस्थानी संस्कृति से अभिभूत रोमर

रोमर
Image caption अमरीकी राजदूत को राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति बेहद पसंद आई.

चाकी तो वैसी ही रही होगी जैसे सैकड़ों साल पहले कबीर के दौर में थी. लेकिन भारत में अमरीका के राजदूत टिमोथी रोमर ने राजस्थान में चलती चाकी देखी तो भाव ज़रूर भिन्न रहा होगा.

रोमर चार दिन तक कूटनीति और राजनय से दूर राजस्थान के जोधपुर में रहे और अपने परिवार के साथ वक़्त गुजारा. वे बेतकल्लुफ़ हो रेगिस्तान के गांवों में घूमे, पानी संरक्षण के तरीके देखे और गुरुवार को चलती चाकी देखी.

रोमर ने जोधपुर से विदा लेते वक़्त मीडिया से कहा, "भारत अमरीका का भरोसेमंद साथी है. राष्ट्रपति ओबामा शीघ्र ही भारत आ रहे हैं. उनका ये दौरा किसी एक देश के लिए अमरीकी राष्ट्रपति का सबसे लम्बा दौरा होगा, जब वो एक मुल्क में इतने दिन रुकेंगे. इसके बाद दोनों देशों के संबध और प्रगाढ़ होंगे."

रोमर ने कहा ओबामा भारत में हर क्षेत्र के लोगों से मिलेंगे.

साझा मुक़ाबला

दुनिया के सामने पसरे आतंकवाद के खतरे पर रोमर ने कहा, "तालिबान हो या लश्करे तैबा, ये अमरीका और भारत के समान शत्रु हैं. हम साझा तौर पर ऐसे तत्वों का मुकाबला करेंगे, हम आपस में इस बारे में जानकारियां भी साझा कर रहे हैं. मुंबई हमले के बारे में हमारा कहना है कि पीड़ितों को न्याय मिले."

जब रोमर को पाकिस्तान को मिलने वाली सहायता के बारे में पूछा गया कि ये पैसा अगर भारत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो तो अमरीका का क्या कदम होगा? रोमर ने कहा कि हम सहायता राशि का दुरूपयोग नहीं होने देंगे.

स्थानीय लोगों का कहना है कि रोमर पहले ऐसे राजदूत हैं जो इस तरह लोगों के बीच घुले मिले और सीधे संवाद कायम किया.

उनके साथ जोधपुर के पूर्व राजघराने के गज सिंह भी थे. अमरीकी राजदूत ने निकट के एक गांव में शिल्पी इक़बाल के घर का रुख़ किया और मिट्टी को कला में ढालने वाली चाकी भी देखी.

कबीर ने इसे दार्शनिक भाव से निहारा था, अमरीकी राजदूत रोमर ने भी इस चाकी को अपलक देखा. उनके लिए ये कौतूहल रहा होगा.

गांवों को देखा

वे खेतों में भी गए, विश्नोई बहुल गांवों में अलमस्त कुलांचे भरते हिरणों को देखा और विश्नोई समुदाय को क़रीब से देखा.

वो रेगिस्तान में पानी बचाने के पारम्परिक तौर तरीके से रूबरू हुए और एक जिज्ञासु की तरह पूरी जानकारी ली.

जल भागीरथी संगठन की कनुप्रिया हरीश ने उन्हें जल प्रबंधन के तरीकों के बारे में बताया जो सदियों से लोग अपनाते रहे हैं.

उन्होंने जल संरक्षण के पारंपरिक ज्ञान की तारीफ़ की. अमरीकी राजदूत मरुस्थली इलाक़े में मिले स्वागत सत्कार से बहुत अभिभूत थे.

वे कहने लगे, "जब कोई भारत आता है तो वो एक सैलानी की भांति आता है,मगर जब वो भारत से विदा होता है तो उसे एक परिवार का हिस्सा होने की अनुभूति होती है."

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