‘अयोध्या फ़ैसले में कई विसंगतियां हैं'

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
Image caption बोर्ड ने कहा कि शरियत के अनुसार मस्जिद की जगह पर लेनदेन से समझौता नहीं हो सकता.

आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अयोध्या के राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर हाल के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय किया है.

बोर्ड ने यह भी साफ़ कर दिया है कि शरियत के अनुसार मस्जिद की जगह पर लेनदेन से कोई समझौता नही हो सकता.

सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लखनऊ के नदवा कालेज में बोर्ड की कार्यकारिणी की बहुप्रतीक्षित बैठक में लिया गया. बैठक की अध्यक्षता बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना सैयद महम्मद राबे हसन नदवी ने की.

प्रेस के लिए जारी एक संक्षिप्त प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘हाईकोर्ट जजमेंट में कई विसंगतियाँ हैं.’

बैठक के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस में बताया गया कि मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने हाईकोर्ट फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला सर्वसम्मति से किया है.

मुसलमानों का अधिकार

बोर्ड के अनुसार ‘यह मुसलमानों का अधिकार है और दायित्व भी कि के वे फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर जजमेंट के जरिये संविधान और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हुई विसंगतियाँ दूर कराएं.’

लेकिन बोर्ड ने यह तय नहीं किया है कि वह खुद सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगा या मामले के पुराने पक्षकारों को समर्थन देगा. बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य ज़फरयाब जिलानी के अनुसार यह बाद में तय किया जाएगा.

इसके लिए बोर्ड के अध्यक्ष और सचिव को अधिकृत कर दिया गया है.

प्रेस कांफ्रेंस में इस बात पर कई सवाल किये गए कि इस मसले को सुलह समझौते से हल करने के बारे में मुस्लिम बोर्ड का क्या रुख है.

बोर्ड के पदाधिकारियों ने कहा कि अयोध्या निवासी और विवाद के एक मुद्दई हाशिम अंसारी समझौते के बारे में जो बातें कर रहे हैं, वह उनका निजी विचार है.

सम्मान का दायरा

बोर्ड की तरफ से कहा गया कि अगर कोई ठोस प्रस्ताव आता है तो बोर्ड बातचीत के लिए तैयार है बशर्ते कि वह प्रस्ताव संविधान, शरियत और मुस्लिम समुदाय के सम्मान के दायरे में हो.

बोर्ड के सहायक महासचिव एम ए रहीम कुरैशी ने कहा कि मस्जिद और मंदिर अगल बगल होने में कोई समस्या नहीं है. देश में कई स्थानों पर पहले से दोनों पूजाघर अगल-बगल बने हैं.

समझौते के सवाल के जवाब में बोर्ड के प्रवक्ता एस आर क्यू इलियास ने कहा कि वास्तव में मस्जिद के मामले में समझौते की गुंजाइश न के बराबर है. चूँकि श्री इलयास के अनुसार शरियत किसी को मस्जिद की जमीन बेचने, दान देने या मस्जिद को दूसरी जगह हटाने की अनुमति नही देती.

'लेन-देन का सवाल नहीं'

Image caption मुसलमानों का एक बड़ा तबका हाईकोर्ट के फ़ैसले से असंतुष्ट है

उन्होंने कहा, ''देखिये हमारा यह रुख है कि जिस जगह मस्जिद बनी वह किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बनी, वह मस्जिद है. वह मस्जिद रहेगी, शरियत के रूह से. शरियत में किसी मस्जिद को सेल करना, बेचना, दान देना या स्थान बदलने की अनुमति नहीं है. ज़ाहिर है हमसे यह अपेक्षा मत करिए कि हम दूसरा फार्मूला आपको दे दें. मस्जिद कोई लेन-देन का सवाल नहीं है. हमें इसका अधिकार नहीं है.''

मालुम हुआ है कि लखनऊ के मौलाना खालिद रशीद फिरंगीमहली समेत कई सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट जाने से पहले समझौते की कोशिश करने की बात कही थी. बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक ने भी सुप्रीम कोर्ट जाने से पहले हाईकोर्ट के जजमेंट की व्यावहारिकता के बारे में विचार करने की सलाह दी थी.

सर्वसम्मति

लेकिन जानकारों के अनुसार बोर्ड के कानूनी सेल के संयोजक वाई एच मुछाला और बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति के संयोजक ज़फर्याब जिलानी ने सुप्रीम कोर्ट जाने की पुरजोर वकालत की.

सुप्रीम कोर्ट जाने के पक्षधर लोगों को कहना था कि चूँकि उनके अनुसार इस फैसले में मुस्लिम पक्ष के सबूतों को नजरअंदाज करके हिंदुओं की परम्परा और विश्ववास पर फैसला दिया गया है इसलिए भविष्य के लिए गलत परम्परा बन जायेगी. इसके बाद सर्वसम्मति से सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय हो गया क्योंकि समझौते की बात करने वाले अल्पमत में थे.

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