मस्जिदों में लाउडस्पीकरों पर सवाल

नक़ाब
Image caption शिवसेना ने भारत में बुर्क़े पर प्रतिबंध की मांग की है.

बुर्क़े पर प्रतिबंध की मांग के बाद शिवसेना ने मस्जिदों में लाऊड स्पीकरों पर निशाना साधा है.

कुछ दिन पहले मुंबई के एक अस्पताल में बच्चा चुराने की घटना हुई थी जिसमें एक बुर्क़ा पहने महिला के शामिल होने की बात की गई थी. सीसीटीवी फ़ुटेज से भी कोई मदद नहीं मिली. सामना में इस पर संपादकीय छपा जिसमें सुरक्षा का हवाला देते हुए बुर्के़ पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई.

तुलना की गई थी तुर्की और फ्रांस से. सामना में लिखा गया कि बुर्क़े का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है और इस पर पूरे भारत में प्रतिबंध लगा देना चाहिए.

अब सामना में मस्जिदों के लाउड स्पीकरों पर निशाना साधा गया है.

सामना में लिखा गया है, "मुंबई नामक शहर में क्या ध्वनि प्रदूषण केवल शिवतीर्थ पर ही है? सुबह सुबह जब बांगी मस्जिद से अज़ान देता है तब लोगों की नींद टूट जाती है. बच्चों की पढ़ाई लिखाई में बाधा उत्पन्न होती है. बूढ़ों और रोगियों को इस ध्वनि के कारण असहनीय कष्ट होता है."

दरअसल लाउडस्पीकरों पर ये तीखा हमला शिवसेना की रविवार को शिवाजी पार्क में हुई दशहरा रैली के बाद आया है. रैली में ध्वनि की निर्धारित सीमा से ज़्यादा आवाज़ करने पर हुई अदालती कार्रवाई से पार्टी नाराज़ थी.

पार्टी प्रवक्ता सुभाष देसाई कहते हैं, "हमारी साल में एक रैली होती है, और उस पर आप सभी कानून बताते हैं."

जब हमने उनसे पूछा कि नवरात्र और कई बार हिंदू भजनों और पूजा के दौरान भी लाऊडस्पीकरों का प्रयोग किया जाता है, तो क्या उस पर भी नियंत्रण होना चाहिए, तो उन्होंने कहा, ‘उस पर तो नियंत्रण है ही. पहले नवरात्री का गरबा एक बजे चलता था, वो अब दस बजे खत्म हो जाते हैं.’

बुर्क़े पर प्रतिक्रिया

उधर कई मुस्लिम संगठनों ने शिवसेना की इन मांगों की आलोचना की है. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की ख़ातून शेख कहती हैं कि शिवसेना की ऐसी मांग पर समुदाय के कट्टरपंथी लोगों को बल मिलता है.

बुर्क़ा मुद्दे पर शिवसेना के वक्तव्य के बारे में उन्होंने कहा, "हम किसी को बुर्क़ा पहनने को नहीं कहते हैं, लेकिन अगर कोई पहनता है तो उसको मना भी नहीं करते हैं. हमें मना करने वाले ये लोग कौन हैं?"

ये पूछने पर कि शिवसेना की इन बातों पर उन्हें पार्टी के बारे में क्या लगता है, तो वो हंसते हुए कहती हैं, "लगता है कि उन्हें हमसे एलर्जी है."

ख़ातून शेख की हंसी अलग, लेकिन आलोचकों का कहना है कि शिवसेना नेता इसलिए खुश हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके ही दबाव का नतीजा है जिसकी वजह से कनाडा में रहने वाले प्रसिद्ध भारतीय लेखक रोहिंटन मिस्त्री की किताब ‘सच अ लांग जर्नी’ को मुंबई विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से हटाया गया है.

इस मुद्दे पर शिवसेना की बागडोर उद्धव ठाकरे के पुत्र आदित्य ठाकरे के हाथ थी. और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भी इस मुद्दे पर शिवसेना के तरफ़ ही खड़े दिखे थे जब उन्होंने किताब की कथित आपत्तिजनक भाषा का विरोध किया था.

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