दरबार मूव सरकार के लिए बड़ी चुनौती

  • 20 अक्तूबर 2010
भारत प्रशासित कश्मीर
Image caption पिछले चार महीनों से भारत प्रशासित कश्मीर में लगभग रोज़ाना विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

भारतीय राज्य जम्मू-कश्मीर भारत का एक मात्र राज्य है जिसकी मौसम पर आधारित दो राजधानियां हैं. यह 130 वर्ष पुरानी परंपरा है जिसको उस समय के महाराजा प्रताप सिंह ने शुरू किया था. इसको "दरबार मूव" कहा जाता है.

गर्मी के छह महीने राजधानी भारत प्रशासित श्रीनगर के ख़ुशगवार मौसम में होती है और शीतकाल में राजधानी जम्मू में होती है जहाँ सर्दी कम होती है.

29 अक्टूबर को श्रीनगर में सरकारी सचिवालय बंद होकर आठ नवम्बर को जम्मू में खुलेगा जहाँ सभी तैयारियां चल रहीं हैं.

वैसे तो यह एक रिवायत है परंतू इस वर्ष का दरबार मूव सरकार के लिए चुनौती भरा होगा क्यूंकि श्रीनगर में छह महीनों में से अधिकतर समय सरकार वहां हिंसक प्रदर्शनों के साथ निपटने में लगी रही.

मई में श्रीनगर में खुले कार्यालयों ने अभी काम करना शुरू ही किया था कि हालात बिगड़ गए और इसके साथ सरकारी काम काज भी ठप्प हो गया.

कड़ी चुनौती

सरकार ने माना है कि इन छह महीनों में न केवल इंसानी जाने गई हैं बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षति भी हुई है जिसकी भरपाई में समय लगेगा.

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने विधान सभा में कहा की इन तीन महीनों की अशांति के दौरान कश्मीर से कई "डॉक्टर, इंजीनियर, विद्यार्थी, व्यापारी और दूसरे शान्ति-प्रिय लोग चले गए हैं."

राज्य में विपक्षी पीपल्ज़ डेमोक्रेटिक पार्टी (पी डी पी) के प्रवक्ता नईम अख्तर कश्मीर की वर्तमान स्थिति को "कारण और प्रभाव की स्थिति कहते हैं."

वो कहते हैं की यह एक नई स्थिति है जिसने जीवन के हर हिस्से को प्रभावित किया है और निसंदेह सरकार के लिए इससे निपटना एक बड़ी चुनौती है.

आर्थिक नुक़सान

श्रीनगर में चैम्बर ऑफ कामर्स और इन्डस्त्रीज़ के प्रमुख शकील कलंदर कहते हैं कि पिछले चार महीनों से कश्मीर को प्रतिदिन 100 करोड़ रूपए का नुक़सान हुआ है.कुल 12 हज़ार करोड़ रूपए की क्षति इन गर्मियों में हुई हैं जिससे हर तरह के छोटे और बड़े व्यापारी पर प्रभाव पड़ा है."

Image caption मुख्यमंत्री ने हाल ही में भारत प्रशासित कश्मीर के भारत में विलय पर ही सवाल उठा दिया है.

कश्मीर में ख़राब स्थिति और ठप्प हुए काम काज के कारण केंद्र के ज़रिए विभिन्न स्कीमों के लिए दिए गए पैसे भी खर्च नहीं हो पाए.

योजना विभाग के एक अधिकारी ने बताया, "सरकार अनुमान लगा रही है कि कितने फंड खर्च नहीं हो पाए. शायद कुछ तो केंद्र को वापिस भी करने पड़ेगें लेकिन हम इसे विशेष केस बनाएंगे ताकि कुछ और मोलत मिल जाए."

जम्मू विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग की प्रो. रेखा चौधरी कहती हैं कि जब सरकार जम्मू आती है तो कई प्रकार कि चुनौतियाँ साथ लाएगी. "सरकार संघर्ष के केंद्र (कश्मीर) से दूर होगी तो किसी स्थिति पर जवाबी कार्रवाई करने में कठिनाई आ सकती है. दूसरा सरकार को यह मान कर चलना होगा कि इस वर्ष के चार महीने बर्बाद हो चुके हैं."

उनका कहना है कि जम्मू दरबार मूव के दौरान सरकार को अपनी वैद्यता स्थापित करनी होगी जिसको ज़ोरदार क्षति पहुँची है.

इसके अलावा जम्मू केन्द्रित राजनीतिक दल भी सरकार को जम्मू के साथ "बरसों से हो रहे कथित भेद भाव, अलगावादियों के प्रति "नरम नीति" और हाल ही में उमर अब्दुल्लाह के विधान सभा में राज्य का भारत के साथ विलय पर प्रश्न उठाने पर घेरने को तैयार है.’’

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