बिहार में बंदर बने चुनावी मुद्दा

  • 21 अक्तूबर 2010
Image caption चैनपुर के मतदाताओं के लिए बंदरो का आतंक प्रमुख चुनावी मुद्दा है

बिहार के जिन इलाक़ों में आज मतदान हो रहा है, वहाँ के कुछ ज़िलों में बंदरो के उत्पात से राहत पाना वोटरों के लिए अनोखी प्राथमिकता है.

बिहार देश के सबसे ग़रीब राज्यों में से एक है, और पिछले कई वर्षों से क़ानून व्यवस्था, जाती आधारित हिंसा और भ्रष्टाचार की वजह से बिहार की छवि ख़राब रही है.

लेकिन सहरसा ज़िले में चैनपुर गाँव के दस हज़ार मतदाताओं के लिए बंदरो का आतंक प्रमुख चुनावी मुद्दा है.

लोगों का कहना है कि कई झुंड में रहने वाले क़रीब 500 बंदरों ने उनकी ज़िंदगी को नर्क बना दिया है.

बंदर उनकी फ़सलों को बरबाद कर देते है, मिट्टी की छत को नुक़सान पहुँचाते हैं, घर से अनाज और रसोई से खाना चुरा लेते हैं.

समस्या इतनी बढ़ गई है कि लोगों को बारी-बारी से दिन रात अपनी फ़सल की निगरानी करनी पड़ती है.

मदन मोहन झा चैनपुर के 60 वर्षीय किसान है. अपनी समस्या बताते हुए मदन कहते है."पिछले तीन साल में हम कंगाल हो गए है. हमें अपने अस्तित्व के लिए बंदरो से लड़ना पड़ता है."

वन्य जीव ऐक्ट की वजह से गाँववाले बंदरो को मार नहीं सकते और राज्य सरकार के अधिकारी उन्हे गाँव से दूर भगा नहीं सकते या कहें कि भगाना नहीं चाहते. ऐसे में गाँववाले हताश हैं.

गाँववाले कहते है कि उन्हे बंदरों की लूट से बचने के लिए हमेशा हाथ में पत्थर और डंडे लेकर चलना पड़ता है.

चैनपुर के निवासी इस समस्या से सबसे ज़्यादा पीड़ित हैं लेकिन आसपास के तेघरा, पारी, बनगाँव और मोहनपुर गाँव भी बंदरों का आतंक झेल रहे हैं.

जो बंदरो को डराएगा.. वोट वही पाएगा

अनुमान लगाया जा रहा है कि सहरसा की दो विधानसभा सीटों में कुल 50,000 लोग इस समस्या से प्रभावित हैं.

गाँववालों का कहना है कि वो पिछले तीन वर्षों से इस समस्या के समाधान के लिए संघर्ष कर रहे है. जिसके तहत उन्होने सड़क जाम करने से लेकर विरोध मार्च तक सब किया.

अपने विरोध को दिशा देने के लिए गाँववालों ने बंदर मुक्ति अभियान समिति का गठन किया है.

सहरसा से विधायक संजीव झा कहते हैं कि उन्होने इस मुद्दे को विधानसभा में दो बार उठाया. चूंकि ये समस्या बिहार के अन्य इलाकों में नहीं है ऐसे में वो अन्य विधायकों के ज़रिए मज़ाक़ का पात्र बन कर रह गए हैं.

लेकिन चैनपुर के गाँववालों के लिए ये हँसी का मुद्दा नहीं है, ये उनकी इकलौती बड़ी समस्या है.

अपनी समस्या को ज़ोरशोर से उठाने के लिए लोगों ने चुनावी नारे भी बना लिए.

"बंदर भगाओ, वोट पाओ" या "जो बंदरो को डराएगा.. वोट वही पाएगा."

लोगों को उमीद है कि कम से कम एक मुख्य दल का नेता उनके गाँव आएगा और उन्हें इस समस्या से निजात दिलाने का वादा करेगा.

फिलहाल निर्दलीय किशोर कुमार मुन्ना के अलावा बाक़ी किसी दल के नेता ने इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया है.

किशोर कुमार मुन्ना कहते हैं, "मैं खुद गाँववालों के साथ मिलकर बंदर भगाने के लिए रणनीति बनाऊँगा. बंदर सचमुच एक बड़ी समस्या है और मै इस समस्या का निदान करवाऊँगा. "

बिहार के सहरसा में गुरुवार को पहले चरण में मतदान हो रहा है.

संबंधित समाचार