मतदाताओं का चुनाव बहिष्कार का फ़ैसला

बिहार चुनाव

इसमें कोई शक नहीं कि इस बार बिहार चुनाव में विकास की चर्चा खूब हो रही है, बहस तेज़ है.

ये भी सच है कि नीतीश सरकार के राज में सड़कें बनी हैं, पुल बने हैं लेकिन अग्नि परीक्षा इस बात की होनी बाकी है कि क्या पूरा बिहार इस लहर के साथ है या नहीं. 24 तारीख को दूसरे चरण का मतदान होना है.

समस्तीपुर ज़िले के आरक्षित रोसड़ा विधानसभा क्षेत्र के 1700 मतदाताओं ने इस दिन का बहिष्कार करने का फैसला लिया है.

विधायकों की अकर्मण्यता, सरकार की उदासीनता और उनके गांव की बरसों से चल रही समस्या का अब तक भी निदान न होने से क्षुब्ध होकर लोकतंत्र के इस महापर्व को उन्होंने नकार दिया है.

रोसड़ा विधानसभा क्षेत्र के बेला गांव जब मैं पहुची तो शाम ढल चुकी थी. गाड़ी रोकर आगे दो-तीन किलोमीटर का रास्ता पैदल ही तय करना था क्योंकि सड़क की हालत दयनीय थी.

इस पर चार पहिए की गाड़ी तो बिल्कुल नहीं चल सकती. बेला गांव में बिजली नही हैं पर जेनेरेटर से रोशनी है. कई घर पक्के हैं.

गांव की लगभग दो हज़ार आबादी है और मतदाताओं की संख्या सत्रह सौ. इस पूरे इलाके मे बाढ़ सबसे बड़ी समस्या है.

गांव वालों ने मुझे गांव के बगल से बह रही कमला और जीवछ नदी को दिखलाते हुए बताया कि तीनों तरफ से ये गांव इन नदियों से घिरा है.

गांव की परेशानी

इनके खेत भी नदी पार कर हैं. नदी पार करने के लिए कोई पुल नहीं है और जा़ड़े के समय में सैकड़ो मवेशी बार बार नदी पार करने के कारण ठंड से मर जाते हैं.

Image caption बिहार चुनावों में इन दिनों विकास एक अहम मुद्दा है

ज़मीन से होकर जाता केवल एक रास्ता है जो इसे बाकी दुनिया से जोड़ता है पर उसकी काफ़ी दयनीय हालत है.

दो साल पहले ऐसा लगा कि बरसों से चली आ रही समस्या का हल हो जाएगा जब प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत यहां काम शुरू हुआ पर जल्द ही बंद भी हो गया. चुनाव बहिष्कार का फ़ैसला इसी गुस्से में लिया गया है.

विधायकों का एक बार चुन कर चले जाना फिर नज़र नहीं आना इस गांव के लिए भी सच है.

सरयू मुखिया की गर्भवती पत्नी पिछले साल यातायात के अभाव में समय से अस्पताल नहीं पहुंच पाई और उनकी मौत हो गई.

सरयू ने बताया,'' हमलोग खटिया पर उसको कंधे पर टांग कर ले गए. लेकिन देरी हो गई. उसको बचा नहीं सके हम. अगर यातायात का साधन होता तो वो निश्चित रूप से बचती.''

गांव में सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष चंद्र राय ने साफ़ किया कि बहिष्कार का फ़ैसला नीतीश कुमार की सरकार के ख़िलाफ़ लिया गया नहीं है बल्कि सरकारी तंत्र के प्रति गांव वालों की क्षुब्धता की निशानदेही है. इस बार कोई वोट नहीं डलेगा.

मैंने उनसे पूछा कि उनके सत्रह सौ वोट नहीं आने से क्या कोई फर्क पड़ेगा तो जवाब आया कि विरोध करने से कम से कम आपके कान तक तो पहुँची ख़बर,सरकार तक भी पहुंच जाएगी.

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों से उठता लोगों का विश्वास और उसके ख़िलाफ़ चुनाव का बहिष्कार अपने आप में एक अहम जनादेश है.

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