चुनौतियां अभी कई हैं

  • 21 अक्तूबर 2010
Image caption पाकिस्तान के एहतेजाज़ दक्षिण एशिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई से खुश हैं

भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच समझदारी बढ़ाने के उद्देश्य से बना दक्षिण एशिया विश्वविद्यालय का सत्र शुरु हो गया है लेकिन इसके समक्ष अभी कई चुनौतियां हैं.

विश्वविद्यालय ने इस समय सिर्फ़ दो कोर्स शुरु किए हैं लेकिन 2014 तक यहां दस से अधिक कोर्स शुरु होने हैं.

यहां इस समय 50 बच्चे पढ़ रहे हैं जिसमें से करीब 20 दक्षिण एशियाई देशों के हैं.

भारत में कई विश्वविद्यालय हैं तो फिर दक्षिण एशिया विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे क्या तर्क थे, विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर जीके चड्ढा कहते हैं, "दक्षिण एशिया देशों का एक ब्लॉक है लेकिन शिक्षा के स्तर पर ऐसा नहीं था. हम चाहते थे कि इन देशों के बच्चे एक साथ पढ़ें और इस क्षेत्र की राजनीति, अर्थव्यवस्था, समस्या और संस्कृति के बारे में एक समझ विकसित करें. इसी सोच के आधार पर यह विश्वविद्यालय बना है. अभी कई चुनौतियां हैं लेकिन हमें सरकार का पूरा समर्थन है."

चडढा बताते हैं कि विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया देशों से भी शिक्षकों का एक निश्चित कोटा होगा जबकि विदेशों के बड़े विश्वविद्यालयों से भी अगर शिक्षक आना चाहेंगे तो उनके वेतन का ख्याल रखा जाएगा.

पाकिस्तान से पढ़ने आए एहतेजाज़ कहते हैं कि वो इस यूनिवर्सिटी से काफ़ी खुश हैं. वो कहते हैं, "सभी ने मना किया कि वीसा नहीं मिलेगा. दिक्कत होगी लेकिन मुझे एक दिन में वीसा मिल गया. पढ़ाई का पैटर्न थोड़ा अलग है लेकिन अच्छा है. मेरे कई कांसेप्ट अब साफ़ हो रहे हैं. मैं अच्छा महसूस कर रहा हूं."

नेपाल के हरिप्रसाद कहते हैं कि अर्थशास्त्र की पढ़ाई में गणित बहुत अधिक है और चूंकि नेपाल में उन्होंने ऐसी पढ़ाई नहीं कि जिससे उन्हें समस्या हो रही है.

प्रवेश परीक्षाओं से नामांकन

हरिप्रसाद कहते हैं, '' नेपाल में मैंने जो पढ़ा था उसमें कोर्स ऐसा नहीं था. इससे मुझे प्राब्लम हो रही है. बाकी कोई दिक्कत नहीं है. यहां बहुत दोस्ती हो गई है. बहुत अच्छी यूनिवर्सिटी है. मैंने अख़बार में देखा था विज्ञापन और अप्लाई किया था.''

Image caption चडढा कहते हैं कि चुनौतियां हैं लेकिन यूनिवर्सिटी बहुत बेहतरीन होगी

कुछ यही बात बाकी छात्रों ने भी कही. कश्मीर से आए मलिक अल्ताफ़ का कहना था कि उन्होंने तो कई दोस्त भी बना लिए हैं. वो कहते हैं, ''मुझे तो कहीं और एडमिशन नहीं मिला तो मैं यहां आ गया लेकिन फायदा है. यहां बाकी देश के लोगों से मिल रहा हूं दोस्ती कर रहा हूं. ये किसी और यूनिवर्सिटी में संभव नहीं है.''

भारत के छात्र सौरभ कहते हैं कि विश्वविद्यालय का कोर्स कई मामलों में अच्छा है. वो बताते हैं, ''मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ा हूं. अब मैं जब अपने दोस्तों से बात करता हूं तो पाता हूं कि यहां जो पढ़ाया जा रहा है वो डीयू में नहीं है. मैं खुद को उनसे आगे पाता हूं. पड़ोसी देशों की समझ भी बढ़ी है क्योंकि वहां के लोगों से बात कर रहा हूं उनसे मिल रहा हूं.''

ये शिकायत कई विदेशी छात्रों की थी लेकिन उनका कहना था कि शिक्षक सहयोग कर रहे हैं और उनकी समस्याओं का निदान कर रहे हैं.

मैंने अर्थशास्त्र के शिक्षक रोहित के सामने जब दक्षिण एशियाई देशों और यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में भिन्नता होने के मसले को रखा तो वो बोले, "हमने बाकी देशों के पाठयक्रम को तो नहीं देखा है लेकिन यहां हमने ऐसा पाठ्यक्रम बनाया है जिससे एक व्यापक समझ बने. हम बच्चों से फीडबैक भी ले रहे हैं. इस कोर्स में हमने दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र पाठ्यक्रम की अच्छी बातें रखने की कोशिश की तो कोर्स थोड़ा कठिन ज़रुर है लेकिन विश्व स्तरीय भी है."

इस वर्ष विदेशों से छात्रों को बिना किसी प्रवेश परीक्षा के एडमिशन मिला है लेकिन अगले साल से सभी एडमिशन प्रवेश परीक्षाओं से ही होंगे.

नए विषय और पाठ्यक्रम

लेकिन क्या क्या विषय पढ़ाए जाएंगे, वीके चड्ढा कहते हैं कि हम उन सभी विषयों पर ध्यान दे रहे हैं जो इस क्षेत्र के लिए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण हैं.

Image caption कक्षा में आपस में बातचीत करते विदेशों के छात्र

वो कहते हैं, "टेक्नॉलॉजी का फ्रंटियर छोड़ नहीं सकते. संस्कृति एक ज़रुरी क्षेत्र है. अर्थव्यवस्था है, कंप्यूटर है. साइंस रिसर्च है. हम भाषा पर भी यहां सेंटर खोलेंगे."

फिलहाल यूनिवर्सिटी के देशी विदेशी छात्र यहां मिलने वाली सुविधाओं से खुश हैं लेकिन उन्हें पाठ्यक्रम की समस्याओं से दो चार होना पड़ रहा है.

इस बारे में शिक्षक कहते हैं कि पहला बैच होने के नाते ये मुश्किलें सामान्य है और आने वाले वर्षों में यह यूनिवर्सिटी विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय के रुप में स्थापित हो जाएगी.

भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच कई स्तर पर सहयोग की बात होती रही है और कई क्षेत्रीय संगठन भी बने लेकिन किसी को भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी. देखना ये है कि लंबे समय में आपसी समझ और सहयोग बढ़ाने की दिशा में भारत का यह क़दम कितना कारगर सिद्ध हो सकेगा.

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