बेचारा भोला-भाला दुखुराम

दुखुराम
Image caption पैसा निकालते ही दुखुराम को हिरासत में ले लिया गया

"जज साहब आप तो यह पैसे पकड़ो और मेरा मामला जल्दी निपटाओ". छत्तीसगढ़ की एक अदालत में मौजूद लोग एक ग्रामीण की यह गुहार सुन कर हक्के-बक्के रह गए.

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा ज़िले के दुखुराम यादव ने भरी अदालत में सीधे जज की टेबल पर ही 300 रुपए रख दिए और अपने मुकदमे को जल्दी निपटाने का अनुरोध कर दिया.

रिश्वत की रकम देख कर जज भी हक्के-बक्के रह गये. आनन-फानन में पुलिस को बुलाया गया और रिश्वत देने वाले दुखुराम यादव को गिरफ्तार कर लिया गया.

जांजगीर-चांपा ज़िले के बिर्रा गांव में रहने वाले दुखुराम का अपने भाइयों के साथ ज़मीन-जायदाद से संबंधित एक मुक़दमा लगभग छह साल से चल रहा है. मुक़दमे की पेशी से परेशान दुखीलाल यादव को उम्मीद थी कि इस महीने उसके मामले में सुनवाई हो जाएगी.

मुक़दमे की पेशी पर जांजगीर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में पहुंचे दुखुराम यादव को जब लगा कि इस बार भी सुनवाई नहीं होगी तो उसने अपनी जेब से सौ-सौ रुपए के तीन नोट निकाल कर जज की ओर बढ़ा दिये. उसने पैसे देते हुये जज से अनुरोध किया कि वे पैसे ले लें और मुक़दमे में सुनवाई कर दें.

भरी अदालत में रिश्वत की इस पेशकश से जज और दुखुराम यादव के वकील सहित दूसरे सभी लोग भौंचक रह गये.

जज के निर्देश पर फौरन पुलिस को बुलाया गया और रिश्वत देने के मामले में दुखुराम यादव को गिरफ़्तार कर लिया गया. मामला रिश्वत की पेशकश का था, इसलिये जज की शिकायत पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने उसके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 8, 12 के तहत मामला दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया.

पत्रकारों से बातचीत में अनपढ़ दुखुराम ने सरलता से जवाब दिया, “मुझे गांव में बताया गया था कि पेशी में पैसे देने पड़ते हैं तभी सुनवाई होती है. बहुत उम्मीद के साथ मैंने जज साहब को पैसे दिए थे लेकिन उन्होंने पैसे नहीं लिए.”

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता जीतेंद्र पाली का मानना है कि न्यायिक सेवा से जुड़े सभी पक्षों को अदालतों में रिश्वतख़ोरी के ख़िलाफ़ आगे आने की ज़रुरत है.

वे कहते हैं, “यह धारणा बहुत गहरे तक भरी हुई है कि अदालतों में बिना रिश्वत लिये मुक़दमे की तारीख़ तक नहीं दी जाती. दुखुराम यादव का उदाहरण इस धारणा को और पुष्ट करता है.”

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