बिहार चुनाव में 'चाणक्य और चंद्रगुप्त'

बिहार चुनाव
Image caption खबरें हैं कि सवर्ण नीतीश कुमार से नाराज़ हैं.

चुनाव के समय जाति-प्रसंग छिड़ ही जाता है. बात बढ़ जाए तो वह मतदान के समय खुल्लम-खुल्ला जातीय तरफ़दारी की शक्ल में भी नज़र आने लग जाता है.

उत्तर प्रदेश में मायावती जी के तल्ख़ तेवर वाले बहुजन समाज के सामने 'हरिजन' या 'दलित' शब्द का उच्चारण भी अक्सर महंगा पड़ जाता है. लेकिन बिहार में वैसी स्थिति नहीं है.

यहाँ कुछ खांटी या छुआ छूती टाइप के झा जी, मिश्र जी या ठाकुर जी अगर दलितों को शूद्र-बोध कराने के लिए जाति सूचक संबोधन का सहारा लेते भी हैं तो दलित लोग मन ही मन भले ही दुखी हो जाएँ, खुलकर मरने-मारने पर उतारू नहीं होते.

लेकिन जब वोट डालने का समय आता है तब वो अपनी बिरादरी के अंदरूनी फ़ैसले पर ही अमल करते है. बहुत पहले यानी मतपत्र और मतपेटी से जुड़े मतदान के दौरान 'बूथ कब्ज़ा' वाले ज़माने में वो ऐसा नहीं कर पाते थे.

वोटिंग मशीन पर बटन दबाने वाले इस ज़माने में वो अपना मताधिकार खुलकर जताने लगे हैं. सिर्फ़ चुनाव ही नहीं कई अन्य मामलों में भी वो मुखर हुए हैं.

विद्वेष

ज़ाहिर है कि कथित ऊंची जातियों के लोग (सवर्ण) अब इनसे उलझने या पंगा लेने से बचते हैं.

वैसे सामाजिक समरसता की बातें प्रायः हरेक नेता के भाषणों में होती हैं लेकिन वो अपने चुनावी स्वार्थ का पोषण या तो जातीय विद्वेष बढ़ाकर या फिर जातियों को जोड़ने जैसा छद्म ओढ़ कर करते हैं.

अगर मौजूदा विधानसभा चुनाव के संदर्भ में ही बात करें, तो सवर्णों को लुभाने वाले वायदे सभी प्रमुख दलों के चुनावी घोषणा-पत्र में फटे पर पैबंद की तरह चिपका दिए गए हैं.

सबको पता है कि चुनाव बीतते ही इन चिपके हुए पैबंदों की कौन कहे, पूरा का पूरा घोषणा-पत्र ही बेकार सा पड़ा रह जाएगा. फिर तो पांच साल तक सत्ता या विपक्ष के सुख-भोग में रमे हुए विधायक और ठगे-ठगे से कुढ़ते मतदाता उन तमाम वायदों के किंतु-परंतु को समझते-समझाते रह जाएंगे.

नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड (जद-यू ) ने कहा है कि अगर उनकी सरकार अगले पांच साल तक बनी रही तो सरकारी नौकरियों में सवर्णों के आरक्षण पर सुझाव के लिए एक आयोग गठित किया जाएगा.

लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने तो बिना किसी आयोग का सहारा लिए, सीधे विधानसभा से प्रस्ताव पारित करा के सरकारी नौकरियों में सवर्णों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण करवाने का वादा किया है.

उधर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस खुद को शुरू से ही सवर्णों का हितरक्षक क़रार देते हुए उनके वोट पर पहला हक़ जताती हैं.

जब नीतीश कुमार को लगने लगा कि उनकी कथित ब्राह्मण-बेरुख़ी चुनाव के समय ज़्यादा प्रचारित हो रही है तो उन्होंने मगध सम्राट चंद्रगुप्त और उनके सलाहकार कूटनीतिज्ञ चाणक्य जैसे ऐतिहासिक पात्रों को अपने संदर्भ से जोड़ा.

नाराज़गी

Image caption दूसरे चरण की 45 सीटों के लिए मतदान रविवार को होंगे

नीतीश बोले "चाणक्य (ब्राह्मण) के बिना चंद्रगुप्त (शूद्र) का काम कैसे चलेगा? हमें तो आपका साथ चाहिए.'' दरअसल पिछड़ा वर्ग आरक्षण विरोधी आंदोलन के समय लालू प्रसाद और नीतीश कुमार पूरी तरह मिल-जुल कर आरक्षण समर्थक खेमे को यहाँ नेतृत्व दे रहे थे.

फिर बिहार में सत्तासीन हुए नीतीश कुमार ने सवर्णों को जोड़े रखने का दायित्व अपनी सत्ता साझीदार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खाते में डाल दिया. कई मामलों में सवर्णों के प्रति जदयू की बेरुख़ी का आरोप उनपर लगा और ख़ासकर ब्राह्मणों की नाराज़गी उनके प्रति बढ़ी.

यही वजह है कि इस चुनाव में लालू प्रसाद से भी आम तौर पर खफ़ा रहने वाला ब्राह्मण समाज नीतीश कुमार के बजाय विकल्प के रूप में कांग्रेस की तरफ झुकता हुआ दिखने लगा है.

चुनाव के पहले दौर में, मिथिलांचल में कहीं-कहीं ब्राह्मण मतों का रुझान कांग्रेस और भाजपा की तरफ ज़्यादा दिखा, जद (यू) और राजद की ओर बहुत कम.

वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में लालू-विरोध के मुख्य वाहक बने सवर्ण समाज ने नीतीश कुमार को सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी.

इस बार के चुनाव में वैसी स्थिति नहीं रहने के संकेत पाकर नीतीश कुमार ख़ासे चिंतित हैं. इसलिए उन्होंने टेलीविज़न चैनलों पर अपनी विज्ञापनी अपील में कहा है कि "पंद्रह साल के खौफ़नाक शासन काल की वापसी मत होने दीजिए, विकास के पक्ष में अपना समर्थन दीजिए."

इस अपील के समय टेलीविज़न पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेहरे की चिंतित मुद्रा यहाँ चर्चा का विषय बन गई है.

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