'दिल में नीतीश लेकिन भोट लालटेनवा पर'

बिहार चुनाव
Image caption बिहार में चुनावों की सरगर्मी हर गली-मुहल्लों में देखी जा सकती थी

अगर बत्ती गुल न होती तो हमारी मुलाकात फय्याज़ साहेब से न होती.

उस दिन सुबह से हम अररिया से लेकर पूर्णिया तक के मुस्लिम बाहुल्य इलाके में घूम कर मुस्लिम मतदाता के मन को भांपने की कोशिश कर रहे थे.

अब थकावट हो चली थी और शाम भी ढलने लगी थी. सोचा रात होने से पहले एक जगह और घूम लिया जाये.

हाईवे पर दशमी का मेला चल रहा था, वहीं उतर कर नज़दीक के मुस्लिम गाँव के बारे में पूछताछ की. पता लगा एकदम सटा हुआ है, पैदल ही जा सकते हैं.

गाँव कुमरवा, जिला पूर्णिया, विधान सभा क्षेत्र बायसी चौक की जगमगाहट से गाँव में उतरने पर घुप्प अँधेरे ने हमारा स्वागत किया.

कीचड़ और गन्दगी से किसी तरह बचते हुए अन्दर घुसे तो कहीं भी पुरुष दिखाई नहीं दे रहे थे. साइकिल पर चलते चलते एक सज्जन ने समझाया कि इस वक्त सब मर्द लोग चौक पर बैठते हैं, वहीं जाकर बात कीजिये.

हम लौटने लगे थे कि मदरसे के भीतर इमरजेंसी लाइट की रोशनी में एक शख्स को बैठे देखा. मोहम्मद फैय्याज़ आलम मदरसे में किरानी हैं.

अंदाज़े बयां से आप यह भी सोच सकते थे कि वे यहाँ के आलिम हैं.

चुनाव की बात

"दिल में नीतीश बसा है लेकिन भोट लालटेनवा पर जाएगा". चुनाव की बात छिड़ते ही उन्होंने स्थानीय समुदाय की मानसिकता को सूत्रबद्ध किया. बात नयी नहीं थी, लेकिन भाषा ने चौंकाया.

यूँ तो बिहार की राजनैतिक भाषा में अलंकार और रूपक मुझे हमेशा आकर्षित करते हैं. लेकिन नीतीश के दिल में बसने वाली बात किसी और मुसलमान ने नहीं कही थी. सुबह से दर्ज़नों लोगों से बात कर चुके थे.

सबने नीतीश सरकार की तारीफ की थी. सड़क, अपराध में कमी, स्कूल में सुधार और अस्पताल की चर्चा मुसलमान ठीक उसी तरह कर रहे थे जैसे बाकी सब लोग.

फ़य्याज़ साहेब ने गिनाया कि उनके मदरसे के लिए इस सरकार ने क्या-क्या किया. अब तक बिजली आ गयी थी, और हम देख सकते थे कि मदरसे की हालत बाकी स्कूलों से उन्नीस नहीं थी.

जदयू के भाजपा से गठबंधन की बात उठाने से भी उनके जवाब में कोई फर्क नहीं पड़ता था. "हाँ गठबंधन है, लेकिन हमें क्या फर्क पड़ता है" की तर्ज़ पर बात सुनने को मिली.

अजब बेपरवाही

मुस्लिम समाज में एक अजब बेपरवाही सी थी, मानो बिहार की सत्तारूढ़ सरकार में भाजपा शामिल ही न हो. एक भी व्यक्ति ने संघ परिवार या हिंदुत्व के खतरे की बात नहीं उठाई.

अब तक कुछ और लोग जुड़ गए थे. उन्होंने वोट के बारे में फ़य्याज़ साहेब के विश्लेषण को पुष्ट किया.

कई क्षेत्रों में घूमने के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि नीतीश सरकार के बारे में अच्छी राय रखने का मतलब यह नहीं है कि वोट जदयू-भाजपा गठबंधन को ही पड़ेगा.

बायसी क्षेत्र को ही लें. यहाँ मुस्लिम कुल आबादी के कोई 75 फ़ीसदी हैं.

तीन दमदार मुस्लिम उम्मीदवार हैं- राजद, कांग्रेस और वर्तमान विधायक जो निर्दलीय हैं. सत्तारूढ़ गठबंधन की तरफ से भाजपा ने एक हिन्दू उम्मीदवार दिया है. तीनों के वोट बांटने से कहीं भाजपा का उम्मीदवार न निकल जाये, इस वजह से मुस्लिम वोट राजद के लोकप्रिय उम्मीदवार हाजी सुभान के पक्ष में झुक रहा लगता है. लेकिन ये वोट हाजी सुभान का है, राजद का नहीं.

नीतिश के लिए लाख हमदर्दी हो, लेकिन उसके चलते मुसलमान अपना वोट भाजपा को तो नहीं डाल सकता. हाँ, अगर जदयू का उम्मीदवार खड़ा हो जाता तो वो मुसलमान वोट का बड़ा हिस्सा ले जाता.

कांग्रेस का उम्मीदवार जहाँ बेहतर है उसे भी वोट मिलेगा. लालू प्रसाद यादव के बारे में सब लोगों ने आदर और स्नेह के साथ बात की, लेकिन यह भी कहा कि उनके राज में दंगों से हिफाज़त के सिवाय और कुछ मिला नहीं. वोट लालटेन को पड़ सकता है, लेकिन अब मुसलमान लालटेन से बंधा हुआ नहीं है.

बिजली आ-जा रही थी और बाकी लोग भी. भीड़ छंटने पर मैंने फ़य्याज़ साहेब से अयोध्या फ़ैसले की बात छेड़ी.

फटाक से जवाब मिला, "नहीं उसका कोई असर हमारे यहाँ नहीं है. यहाँ सब अमन है, हिन्दू-मुस्लिम के बीच कोई वैसी बात नहीं है." यह उत्तर सुबह से दसियों बार सुन चुका था, और मेरा अगला सवाल भी तैयार था.

कौन खड़ा होगा?

"अमन तो मिला, लेकिन इन्साफ मिला क्या?" इस सवाल के जवाब में मैंने अक्सर चुप्पी सुनी थी. लेकिन फ़य्याज़ साहेब चुप रहने वाले शख्स नहीं हैं. "छोड़िये, इन्साफ मांग कर हमें क्या मिलेगा. हमारे साथ कौन खड़ा होगा?"

मैंने प्रतिवाद किया, चूंकि मैं नहीं मानता कि हिन्दुतान में इन्साफ के साथ खड़े होने वाले लोग नहीं हैं.

अब फ़य्याज़ साहेब के स्वर में तल्ख़ी थी "भागलपुर हुआ, मेरठ हुआ, गुजरात हुआ ... उसके बाद कोई इन्साफ हुआ? हमें गला कटवाना है इन्साफ मांगकर? ... देखिये जनाब, हम इस देश में मेहमान की तरह हैं, उसी औकात में रहें तो हमारे लिए अच्छा है."

मैं उनसे तर्क-वितर्क करना चाहता था, झगड़ना चाहता था. आप भला मेहमान कैसे हुए? जिस मिट्टी में मेरे दादा-परदादा की राख है, उसी में आपके पुरखे भी गड़े हैं. मुसलमान इस देश में किराएदार नहीं हैं, वो भी उतना ही मालिक है जितना मैं हूँ. पता नहीं कितनी बात उनसे कह पाया और कितनी अपने आप से कही. शाम अचानक रात में बदल गयी थी.

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