उलझा हुआ है मुसलमानों का गणित

मुसलमान
Image caption कई मुसलमान अयोध्या फ़ैसले से दुखी हैं

बिहार की आबादी का लगभग 17 प्रतिशत मुसलमानों का है. कई इलाक़ों में ये 40 प्रतिशत तक है. ज़ाहिर है राजनीतिक ताने-बाने में ये धागा काफ़ी अहम है.

पिछले दिनों जब इलाहाबाद हाई कोर्ट का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में मालिकाने हक़ पर फ़ैसला आया तब से ये चर्चा गर्म हो गई कि क्या इस फ़ैसले का बिहार चुनाव में असर दिखेगा?

पहले चरण में कई मुस्लिम बहुल इलाक़े में मतदान हो गया है और 24 तारीख़ को भी कई मुस्लिम बहुल इलाकों में मतदान हो रहा है. आख़िर क्या सोच रहा है बिहार का मुस्लिम समुदाय?

क्या इस मुद्दे पर शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के मुसलमानों की सोच में अलग-अलग धाराएँ हैं?

इनकार

दरभंगा के ग्रामीण इलाक़े में रह रहे मोहम्मद सामी की उम्र 50 से ऊपर होगी. चाय की चुस्कियों के साथ जैसे ही मैंने ये सवाल रखा कि क्या अयोध्या फ़ैसले से मुस्लिम वोटरों पर कोई असर पड़ेगा, उन्होंने बड़ी सादगी से इसे ख़ारिज कर दिया.

मोहम्मद सामी कहते हैं, "इसकी चर्चा का कोई मतलब ही नहीं है. अयोध्या में मंदिर-मस्जिद कोई आज से बना है. सदियो से है. कोर्ट के फ़ैसले से इस बार का वोट क्यों बदलेगा. ये कोई मुद्दा नहीं है हमारे बीच. हमलोग गांव में रहते है. वहाँ इन सब बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. शहर की बात अलग है."

मुझे लगा क्या माइक पर ‘सही-सही’ बोलने की बाध्यता में तो ऐसा नहीं कर रहे हैं मोहम्मद साब. लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में मेरा जितना घूमना हुआ और जिनसे बातें हुई तो ऐसा लगा कि कुछ हद तक मोहम्मद सामी वही कह रहे थे जो उनके समुदाय के कई लोग सोच रहे हैं.

लेकिन शहरी इलाक़ों की तस्वीर और तेवर अलग थे. पटना के नज़दीक एक बडे मुस्लिम इलाक़े फुलवारी शरीफ़ में इस सवाल ने तीखी बहस छेड़ दी.

बहस की शुरूआत की मोहम्मद मक़सूद ने. उन्होंने कहा कि अयोध्या के फ़ैसले ने हिंदुस्तान के पूरे मुसलमान के साथ अन्याय किया है.

उन्होंने कहा, "जो इंसाफ़ होना चाहिए था वो इंसाफ़ नहीं हुआ है और सारे मुसलमानों को रौंद दिया गया है. हम ख़ुद अपना ख़र्चा करके कांग्रेस को वोट नहीं देंगे. इसीलिए हम कांग्रेस को वोट नहीं देंगे. मुसलमान अब दबेगा नहीं, कहानी कहीं लिखी जा चुकी है."

उनकी बात में सुर मिलाया वहीं मौजूद मोहम्मद शाबान ख़ान ने. उनका कहना था कि कांग्रेस ने मुसलमानों के साथ वही किया जो भाजपा करती है. मुसलमान धर्मनिरपेक्ष ताक़तों के साथ रहेंगे. कौन है वो ताक़तें ये किसी से छुपी नहीं है.

बिहार के 243 विधानसभा सीटों में से कम से कम 60 ऐसी सीटें मानी जाती हैं, जिनमें मुस्लिम वोटों की भूमिका अहम होगी और 50 अन्य ऐसी सीटें जिनपर भी इस समुदाय के वोटों का प्रभाव पड़ेगा.

असर

ऐसे मामलों में धार्मिक नेताओं की सोच और राय भी असर रखती है. फुलवारी शरीफ़ स्थित इमरात शरिया के नाज़िम और बिहार सरकार के हज हाउस के चेयरमैन मौलाना अनीसुर रहमान क़ासमी ने भी इशारे में अपनी बातें रखीं और कहा कि इस फ़ैसले से मुसलमान कैसे वोट देंगे उस पर थोड़ा असर तो पड़ेगा ही.

Image caption मौलाना क़ासमी अयोध्या फ़ैसले के असर से इनकार नहीं करते

मौलाना क़ासमी का मानना था कि पिछले चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने एकमुश्त वोट नहीं किया और ना ही उनको वोट दिया जो जीत सकते थे. हारे घोड़ों पर बाज़ी लगाकर मुसलमानों ने विधानसभा और संसद में अपनी आवाज़ खो दी है और इसका असर उनकी राजनैतिक हैसियत पर भी पड़ता है.

पिछले विधानसभा में 243 में से केवल 16 मुस्लिम विधायक थे. इस समुदाय का विधानसभा पहुँचने का दर केवल सात से आठ प्रतिशत हो गया है.

इस समुदाय के प्रतिनिधि, धार्मिक नेता और बुद्धिजीवी मानते हैं ये अच्छी तस्वीर नहीं है. बिहार के जाने माने बुद्धिजीवी गांधीवादी रज़ी अहमद बेलाग अपनी बात रखते हैं कि बात अयोध्या की हो या राजनीति में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व की, उन्हें कमतर आंकने की भूल करना बेवकूफी होगी.

वे कहते हैं, "लालू जी ने एम-वाई का फ़ॉर्मूला दिया था. इसमें वाई ही रहा, एम तो हाशिए पर ही रहे. अब लग रहा था कि मुसलमान जो लालू से दुखी थे, नीतीश भाजपा की पालकी ढोए हुए हैं, कम्युनिस्ट पार्टियां धाराशायी हैं तो मुसलमान कांग्रेस की तरफ मुख़ातिब हो रहा था लेकिन अयोध्या के फ़ैसले ने सारी चीज़े बदल दी. पूरी बिरादरी में, उर्दू अख़बारों में यही चर्चा है कि केंद्र ने चीज़े उलझा कर रख दी है. इस बार जो भी होगा चुनाव में सही समय पर सही फ़ैसला लिया जाएगा."

बात उलझी हुई है, क्या अयोध्या के फ़ैसले से मुसलमानों का झुकाव लालू यादव की तरफ़ होगा या नीतीश कुमार की तरफ़- ये साफ़ नही है. हां, एक बात ज़रूर उभर कर सामने आई है कि इस चुनाव में कांग्रेस के पुनरोत्थान की जो चर्चा थी जिसमें मुसलमानो की अहम भूमिका हो सकती है, उस पर एक चोट नज़र आती है.

संबंधित समाचार