धमाके की योजना और भाईचारे का स्वांग

  • 25 अक्तूबर 2010
अजमेर बम धमाके
Image caption अजमेर दरगाह में 2007 में बम धमाके हुए थे जिसमें कई लोग मारे गए थे

अगर अजमेर धमाकों के आरोप पत्र में वर्णित तथ्यों पर भरोसा करें तो लगता है कि जयपुर में गुजराती समाज का गेस्ट हाउस एक ही समय में दो विपरीत धाराओं का गवाह बना हुआ था.

वहाँ गुजराती समाज के गेस्ट हाउस में एक धारा विध्वंस के मंसूबों की इमारत खड़ा करना चाहती थी तो दूसरी में दो धर्मो के बीच आपसी भाईचारे और सदभाव की बयार बहती नज़र आती थी.

लेकिन जो कुछ भी आरोप पत्र में बयान किया गया है, उससे राष्ट्रीय स्वयंसेवी संघ (आरएसएस) की कथित 'राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठन' मुहिम को धक्का लगा है.

इस मुहिम में गुजराती समाज का गेस्ट हाउस एक अहम पड़ाव था.

अजमेर दरगाह में तीन साल पहले हुए धमाकों में दाख़िल आरोप पत्र में कहा गया है कि आरएसएस के वरिष्ठ अधिकारी इंद्रेश कुमार ने धमाकों में शामिल लोगों की एक बैठक 31 अक्तूबर, 2005 को गेस्ट हाउस के कमरा नंबर 26 में संबोधित की थी.

पुलिस जाँच के मुताबिक यहीं पर बम धमाके की योजना को अमली जामा पहनाने का खाका तैयार किया गया.

ये वो दौर था जब राज्य में भाजपा की सरकार थी और सत्ता में ऊँचे बैठे भाजपा नेताओं पर इंद्रेश कुमार का गहरा असर था.

सकते में लोग

जयपुर का ये गेस्ट हॉउस वर्ष 2005 में आरएसएस की राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठन बनाने की गतिवधियों में एक प्रमुख पड़ाव बन कर उभरा.

Image caption गुजराती समाज के इसी गेस्ट हाउस में होती थीं बैठकें.

ऐसी ही एक बैठक 12 जनवरी, 2005 को गेस्ट हाउस में हुई और उसमें इंद्रेश कुमार ने आरएसएस की भावना मुस्लिम प्रतिनिधियों के सामने रखी.

उसमें सलावद ख़ान जैसे लोग भी थे जो बाद में मुस्लिम वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष भी बने.

वे राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच के प्रमुख लोगों में गिने जाते थे लेकिन अब वो अपनी बात कहने के लिए फ़ोन पर उपलब्ध नहीं हो रहे है.

इन राष्ट्रवादी मुस्लिम मंचों की बैठको में मौजूद रही सरोज ख़ान मायूसी के साथ कहती हैं,"अगर ये सच है तो मुसलमानों की भावना से खिलवाड़ किया गया है. अगर ये कोई ऊँची राजनीति का खेल है तो फिर हम क्या कहें. इंद्रेश जी दोनों धर्मो में बहुत ही भाईचारे की बात करते थे."

हाफ़िज़ मंज़ूर महार अब अली एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

वो भी उन लोगों में थे जो इंद्रेश के बुलावे पर राष्ट्रवादी मुस्लिम मंचों की बैठकों में शिरकत करते रहे.

महार अब अली कहते हैं," मुझे इस नए ख़ुलासे पर कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि समाज में ऐसे कई लोग हैं जो दो चेहरों के साथ जीते है. इंद्रेश मुसलमानों को अपनी सोच में ढ़ालना चाहते थे लेकिन मैंने ये नहीं सोचा था कि कोई इस सीमा तक भी जा सकता है."

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