कुम्हरार में विकास की बयार का सच

कुम्हरार
Image caption कुम्हरार में घरों के बाहर और सड़क पर कूड़े-कचरे का अंबार लगा है.

मौर्य साम्राज्य में पाटलिपुत्र रहे पटना से सटा कुम्हरार उस काल में अपने प्रशासनिक महत्व के लिए जाना जाता था.

लेकिन आज कुम्हरार की दशा बेहद खराब है.

मौजूदा विधानसभा चुनाव में चारों ओर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के विकास के नारों का शोर है.

एनडीए के सभी उम्मीदवार पांच साल में किए गए विकास की दुहाई देकर मतदाता से एक और मौका दिए जाने की मांग कर रहे हैं.

कहा जा रहा है कि पटना की सड़कें सुधर गई हैं और कानून का राज कायम हो गया है. अपराध और अपराधियों के दिन लद गए हैं, शहर में महिलाएं बेखौफ होकर रात के ग्यारह बजे भी सहजता से बाहर निकल सकती हैं और शहरों में बिजली पर्याप्त रहती है.

विकास से अछूता

सबसे अव्वल की लोग आरजेडी के 15 साल के कथित कुशासन के बाद विकास के अनवरत जारी रहने को लेकर आशावान हो गए हैं.

लेकिन विकास की ये अभूतपूर्व आंधी पटना स्टेशन से महज पांच किलोमीटर दूर जाते-जाते लगता है थम गई है.

सड़कों पर बारिश बंद होने के करीब एक महीने बाद भी पानी जमा है, ज़्यादातर घर पानी में आधे डूबे नज़र आते हैं, जल-जमाव की वजह से मच्छरों को पनपने और फलने-फूलने की पूरी सहूलियत मिल गई है.

घरों के बाहर और सड़क पर कूड़े-कचरे का अंबार लगा है जिनसे ऐसी बदबू आती है कि सड़क पार करना मुश्किल हो जाता है.

विकास की आस

लेकिन विकास की बयार कुछ ऐसी है कि बदहाल कुम्हरार के लोग भी विकास की आस में नेताओं के नारों पर मुहर लगाते नहीं थकते.

लोगों का कहना है कि पांच साल पहले ये इलाका शाम छह बजे के बाद सूनसान हो जाता था, कोई ग़लती से इधर आ भी जाता तो अपराधियों के चंगुल से उसका बच पाना मुश्किल होता था.

महिलाएं खौफ़ से घर के बाहर कदम नहीं रखती थीं. लेकिन अब हालात बदले-बदले से हैं. लोग इस बात से ही संतुष्ट नज़र आते हैं कि एनडीए शासन के पांच सालों में इस इलाके का विकास भले ही न हुआ हो, उन्हें बुनियादी सुविधाएं भले ही न मिली हों लेकिन एक आस तो बंधी है.

एक ऐसी उम्मीद कि आगे अगर एनडीए की सरकार सत्ता में बनी रहती है तो जो कमियां रह गई हैं वो आने वाले सालों में पूरी हो जाएंगी.

पार्टी बनाम नेता

Image caption बारिश बंद होने के बाद भी कुम्हरार के ज़्यादातर घर पानी में आधे डूबे नज़र आते हैं.

इस इलाके के बीजेपी विधायक अरुण सिन्हा से लोगों को कई शिकायतें हैं. लोगों का कहना है हमेशा समर्थकों से घिरे रहने वाले विधायक जी को पांच साल में शायद ही कभी अपने मतदाताओं की याद आई हो, लेकिन फिर भी ज़्यादातर मतदाता विकास की आस को बरकरार रखने के लिए उनकी जीत की कामना कर रहे हैं.

ऐसे मतदाताओं का कहना है कि उनका वोट विधायक को नहीं एनडीए को जाएगा.

इलाके की हालत इतनी बुरी होने के बावजूद ज़्यादातर मतदाताओं को ये आस क्यों है, इसका जवाब इतना आसान नहीं.

अभाव और पिछड़ेपन का एक लंबा दंश झेलनेवाली जनता शायद खुशफ़हमी की इस उम्मीद को बनाए रखना चाहती है कि कभी तो दिन बहुरेंगे. सुधार की जो झांकी मिली है वो कभी तो मुकम्मल रूप में सामने आएगी.

चुनाव की बिसात

लेकिन अभी ये कह पाना आसान नहीं कि कुम्हरार में जिन लोगों को मैंने सुना या जो कुछ अपनी आंखों से देखा वो बिहार की चुनावी राजनीति की बिसात पर मुहरों को कौन सी चाल देगी.

यहां मुकाबला भले ही बीजेपी के अरुण सिन्हा, एलजेपी के कमाल परवेज़ और कांग्रेस के कपिलदेव प्रसाद यादव के बीच हो लेकिन भीतर ही भीतर सत्ता के निराले खेल रचने वाली जनता के मानस में क्या है इसकी थाह लगा पाना इतना सरल नहीं.

कुम्हरार में यादव, कुर्मी, मुसलमान और अगड़ी कही जानेवाली जातियों की अच्छी संख्या है और इन्हीं के समर्थन अनुपात से ये तय होगा कि विकास की आस के खेल में अगले पांच साल के लिए इस इलाके की जनता किसे अपना विधायक चुनती है.

ये बात सिर्फ़ कुम्हरार का सच नहीं बल्कि पूरे बिहार का सच है क्योंकि मीडिया और चुनावी सर्वेक्षणों में लालू विरोधी तगड़ी बयार के बावजूद बिहार की जनता ने 1995 में लालू यादव को दोबारा सत्ता सौंप दी थी.

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