'बहुत कुछ सुनना पड़ा है'

सुबोध नारायण मालाकार

सुबोध मालाकार एक ज़माने में जेएनयू की छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं.

बिहार विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र हम उन लोगों के अनुभव आपसे साझा कर रहे हैं जो बिहार से बाहर रह रहे हैं. उन्होंने बिहारी होने के कारण क्या देखा, सोचा और जाना. इसी शृंखला में जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में प्रोफेसर सुबोध नारायण मालाकार के अनुभव.

मैं बिहार के अत्यंत पिछड़े इलाक़े सहरसा से अस्सी के दशक में दिल्ली आया था जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए. बिहार में बड़ा नाम है इस विश्वविद्यालय का.

लेकिन जब मैं आया तो यहां बहुत प्राब्लम हुई थी. यहां सब लोग अंग्रेज़ी बोलते थे. हम अंग्रेज़ी लिख लेते थे लेकिन बोल नहीं पाते थे तो बहुत इंफीरियरिटी कांप्लेक्स होता था.

क्लिक करें प्रोफेसर मालाकार के अनुभव उनकी जुबानी: ऑडियो

मैं छात्र नेता था लेकिन एमए तक अंग्रेज़ी नहीं बोल पाता था. पीएचडी तक भी बहुत अच्छा नहीं हो पाया. आगे चलकर सेमिनार में बोलते बोलते अब दिक्कत नहीं है. ये समस्या बिहार के कई लोगों को होती है. बड़ा अपमानित महसूस करता था.

लोग हंसते थे मेरी अंग्रेज़ी सुन कर लेकिन उनको ये पता था कि मैं बात सही कह रहा हूं. मैं एक बार यूजीसी में रिसर्च एसोसिएट पद के लिए इंटरव्यू देने गया और हिंदी में बात की तो इंटरव्यू लेने वाले ने कहा कि आपको अंग्रेज़ी बोलना चाहिए. वहां नौकरी नहीं मिली. मैं निराश नहीं होता था लेकिन बुरा ज़रुर लगता था.

बिहार वालों के साथ समस्याएं तो होती ही हैं. अंग्रेज़ी बोलना नहीं आता है. लिखते अच्छा है. मैं गांव देहात का हूं. हमारे खाने पीने के तौर तरीके अलग है. मैं अभी भी चम्मच से नहीं खा पाता हूं. हम ऊंगलियों का इस्तेमाल करते हैं. सांस ज़ोर ज़ोर से लेता हूं.

इन बातों पर लोग ध्यान देते हैं और कहीं न कहीं वो इस मामले में हेय दृष्टि से देखते थे लेकिन मैं इस पर गर्व करता हूं.

अंग्रेज़ी बोलना नहीं आता है. लिखते अच्छा है. मैं गांव देहात का हूं. हमारे खाने पीने के तौर तरीके अलग है. मैं अभी भी चम्मच से नहीं खा पाता हूं. हम ऊंगलियों का इस्तेमाल करते हैं. सांस ज़ोर ज़ोर से लेता हूं

सुबोध मालाकार

जब दक्षिण भारत के लोग अंग्रेज़ी बोलते हैं तो क्या वो अलग नहीं होता है लेकिन उन पर कोई हंसता नहीं है.. मैं तो ये कहता हूं कि बिहार के लोगों को अपना बिहारीपन बरकरार रखना चाहिए क्योंकि यही उनकी खूबी है.

यहां बस में चढ़िए और कुछ ग़लती हो जाए तो लोग कहते हैं कि बिहारी है लेकिन लोग मानते हैं कि बिहार के लोगों में शैक्षणिक ताकत है और दिल्ली में तो संख्या बल भी बिहारियों का हो गया है.

बिहार के लोगों को बहुत कुछ सुनना पड़ता है इसमें दो राय नहीं लेकिन उनको अपनी मेहनत, अपना तरीका बरकरार रखना चाहिए क्योंकि यही उनकी पहचान है और इसी से वो आगे भी बढ़ सकते हैं.

मैं प्रोफेसर हूं लेकिन अभी भी जब बोलता हूं तो लोग समझ जाते हैं कि बिहार का हूं.. इससे मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है. मैं बात क्या कह रहा हूं वो महत्व रखता है और मैं कायदे की बात कहता हूं.

(बीबीसी संवाददाता सुशील झा से बातचीत पर आधारित)

अगर आप इस बारे में कुछ कहना चाहते हैं तो अपनी राय हमें भेजिए...

वर्चुअल की-बोर्ड

* का निशान जहाँ है वहाँ जानकारियाँ अवश्य दें

(अधिकतम 500 शब्द)


BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.