लोगों का चैनल...

रेडियो टीम
Image caption गुड़गांव के रेडियो की टीम स्थानीय लोगों के साथ बनाई गई है

दिल्ली से सटे गुड़गांव में एक सामुदायिक रेडियो ने पिछड़े समझे जाने वाले समुदाय के लोक गीतों और संस्कृति को नई पहचान दे दी है.

ये रेडियो स्टेशन बहुत छोटे पैमाने पर चलता है लेकिन इसकी पहुंच श्रोताओं के दिलों तक हो गई है.

स्टेशन को शुरु हुए एक साल ही हुआ है लेकिन यह दिन में 22 घंटे प्रसारण करता है और लोग अपनी फरमाइशें भी करते हैं.

लेकिन ये फरमाइशें फ़िल्मी गानों की नहीं बल्कि स्थानीय लोक गीतों की होती हैं. हरियाणा की रागिनी हो या तुकिया या फिर बिहार के प्रवासियों की भोजपुरी गानों की फरमाइश. यहां सबकुछ बजता है.

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स्टेशन प्रमुख आरती जयमन कहती हैं, ‘‘ इस सामुदायिक स्टेशन का उद्देश्य समाज के उन लोगों तक पहुंचना था जो विकास की दौड़ में शायद पीछे छूट गए हैं. हम चाहते हैं कि स्टेशन का एजेंडा भी लोग ही बनाएं इसलिए हम फीडबैक को गंभीरता से लेते हैं. लोग हर दिन फोन करते हैं. पहले फरमाइशी गीतों का कार्यक्रम नहीं था. हमने लोगों के कहने पर शुरु किया है.’’

स्टेशन में फ़िल्मी गाने या सीडी नहीं बजते लेकिन अगर कोई लोक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करना चाहे तो उसका स्वागत होता है.

ऐसे की रागिनी गाने वाले या घरेलू महिलाएं इस स्टेशन में आकर अपनी प्रतिभा दिखा चुकी हैं.

लोगों की भागीदारी

ऐसे ही एक कलाकार चेतन हैं. वो कहते हैं, ‘‘ मैं रागिनी गाता हूं. ये स्टेशन पहले सुना नहीं था. जब पहली बार आया तो बहुत अच्छा लगा. आज मैं स्टेशन के लिए कुछ गीत लाया हूं और साथ ही भ्रूण हत्या और मां बाप के सम्मान के भी कुछ गीत हैं मेरे पास.’’

Image caption ताराचंद सिक्योरिटी गार्ड हैं और सामुदायिक रेडियो के श्रोता भी

गुड़गांव की आवाज़ नामक यह रेडियो गुड़गांव के टैक्सी चालकों, सुरक्षा गार्डों और गांव देहातों में बहुत लोकप्रिय है.

इस रेडियो के श्रोता ताराचंद भटनागर सिक्योरिटी गार्ड हैं, वो कहते हैं, ‘‘ मैं दिन भर यही स्टेशन सुनता हूं अपने मोबाइल पर. इसमें शिक्षाप्रद कार्यक्रम होते हैं. रागिनियां होती हैं. किस्से होते हैं. स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़े कार्यक्रम बहुत अच्छे होते हैं.’’

बिहार से आकर गुड़गांव में काम करने वाले अजय ब्रिजवासन कहते हैं, ‘‘ ये रेडियो स्टेशन रोज़गार के अवसरों के बारे में बताता है. वो बहुत अच्छा कार्यक्रम है. भोजपुरी गाने की फ़रमाइश भी करते हैं हम. हमें हरियाणवी गाने भी अच्छे लगते है. मैं तो वो भी सुनता है. कोई ग़लती है तो शिकायत भी करता हूं. रेडियो वाले लोग शिकायतें भी सुनते हैं हमारी’’

सामुदायिक रेडियो स्टेशनों को ख़बरें देने की अनुमति नहीं है लेकिन आरती अपने तरीके से ही विवादित मुद्दों पर बहस कराने की कोशिश करती हैं.

वो बताती हैं, ‘‘ कुछ महीनों पहले कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान यहां से बिहारी मज़दूरों को वापस भेजा जा रहा था. उसमें हमारे कई श्रोता थे जिन्होंने ये बात कही. हमने बहस कराई तो हरियाणा के कई लोगों ने आपत्ति की. हमने कहा आप आइए अपनी बात रखिए और एक संवाद कायम हुआ. हां विवादित कार्यक्रम थोड़े संवेदनशील होते हैं और इसमें काफ़ी ध्यान रखा जाना चाहिए. हमारे ऊपर बड़ी ज़िम्मेदारी है इस संदर्भ में देखें तो.’’

ये रेडियो स्टेशन लोगों की राय से चलता है जो किसी भी कम्युनिटी रेडियो को करना चाहिए, शायद इसलिए ये सफल दिखता है

सरकारी नीति सही नहीं

Image caption चेतन नौकरी करते हैं और समय मिलने पर रागिनी गाते हैं

लेकिन क्या हर सामुदायिक रेडियो इतना सफल है. भारतीय कम्युनिटी रेडियो फोरम के महासचिव साजन वेनियुरी कहते हैं , ‘‘देखिए सरकार ने बड़े शिक्षण संस्थानों को और स्वयंसेवी संस्थाओं को कम्युनिटी रेडियो के लाइसेंस दिए लेकिन हमारा ये कहना है जो हमने देखा है कि बड़े शिक्षण संस्थान जैसे दिल्ली यूनिवर्सिटी या कोई और एक समुदाय से कैसे जुड़ेगा. ये समस्या है. उनके पास वो ढांचा नहीं है जुड़ने का. कुछ लोग अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन कई एनजीओ भी ऐसे हैं जो लाइसेंस लेने के बाद कोई बढ़िया काम नहीं कर रहे हैं.’’

वेनियुरी कहते हैं कि किसी भी कम्युनिटी रेडियो के लिए ज़रुरी है कि लोग उससे जुड़ें. वेनियुरी कहते हैं कि कम्युनिटी रेडियो के मामले में सरकार की नीति सही नहीं है.

वो कहते हैं, ‘‘हम दुनिया के एकमात्र लोकतांत्रिक देश होंगे जिन्होंने अभी तक सबसे सस्ते माध्यम यानी रेडियो पर ख़बरों के प्रसारण को अनुमति नहीं दी है. सबको लगता है कि एफएम होना चाहिए ताकि शहरी लोगों के पास विकल्प हो. ख़बर नहीं देंगे आप उस पर. कोई गांव के लोगों के लिए सोचता नहीं है कि उन्हें भी ख़बर चाहिए क्योंकि वो विज्ञापन नहीं देखेंगे क्योंकि वो ग़रीब हैं. ऐसी नीति तो बिल्कुल ग़रीब विरोधी है.’’

सामुदायिक रेडियो स्टेशनों का लाइसेंस लेना मुश्किल काम है और लेने के बाद इसे विज्ञापनों की भी दिक्कत होती है. लेकिन गुड़गांव की आवाज़ जैसे स्टेशन एक नई राह दिखाते हैं.

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