एवरेस्ट पर बजेगी मोबाइल की घंटी

  • 29 अक्तूबर 2010
एवरेस्ट

सर एडमंड हिलेरी 1953 में जब पहली बार एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे, तब उन्होंने अपनी कामयाबी का संदेश दुनिया तक पहुंचाने के लिए नज़दीक के डाकघर तक अपने दूत भेजे.

पिछले कुछ सालों से पर्वतारोहियों ने बाहरी दुनिया से संपर्क करने के लिए सैटलाइट फोन का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया है.

लेकिन अब एवरेस्ट पर भी मोबाइल की घंटी बजेगी और इंटरनेट के ज़रिए पर्वतारोही दुनियाभर से अपने अनुभव साझा कर सकेंगे.

3जी स्टेशन

नेपाल की संचार कंपनी ‘एनसेल’ का कहना है कि उसने एवरेस्ट बेस कैंप तक जाने वाले रास्ते में 3जी स्टेशन खड़े किए हैं.

सबसे ऊंचा स्टेशन 5200 मीटर की ऊंचाई पर लगाया गया है. कंपनी को उम्मीद है कि हर साल एवरेस्ट के क्षेत्र में पैदल यात्रा करने के लिए आने वाले हज़ारों पर्यटक इन सेवाओं का इस्तेमाल कर सकेंगे.

Image caption एनसेल का कहना है कि उसके नए नेटवर्क से पर्वतारोहियों की कार्यशैली पर फर्क पड़ेगा.

एनसेल का कहना है कि उसके नए नेटवर्क से पर्वतारोहियों की कार्यशैली पर फर्क पड़ेगा. वो पहाड़ चढ़ते समय मौसम और सुरक्षा की जानकारी ले सकेंगे.

मुश्किलें होंगी आसान

जहां कई लोग एवरेस्ट पर होते हुए बाहरी दुनिया से जुड़े रहने के इस मौक़े का स्वागत कर रहे हैं वहीं कुछ का मानना है कि पहाड़ों का दुनिया से अलग रहना है ही आरोहण का खूबसूरत पहलू है और संचार के दखल से वहां की वीरानगी में कमी आ जाएगी.

एवरेस्ट तक तकनीक की बयार पहुंचने से नाखुश लोगों के लिए एन सेल के कार्यकारी अधिकारी पासी क्वाइस्टनेन के अपने तर्क हैं.

उनका कहना है कि ये तकनीक फायदेमंद है या नहीं ये तो पर्वतारोहियों से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता, लेकिन इतना ज़रूर है कि जब कभी हम पर्वतारोहियों की ऐसी फिल्में देखते हैं जिनमें वो वीरान पहाड़ों पर तूफान के कारण फंस जाते हैं, तो उन दृश्यों को देखकर एहसास होता है कि तकनीक पर्वतारोहियों की बड़ी मुश्किलों को भी आसान कर सकती है.

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