ताज मामला: सुनवाई पर विवाद

मायावती
Image caption ताज कोरिडोर मामले में जनहित याचिकाओं को लेकर सितम्बर 2009 में मुख्यमंत्री मायावती को नोटिस जारी किए गए थे.

बहुचर्चित ताज कोरिडोर घोटाले में मुख्यमंत्री मायावती और कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर मुकदमा चलाने के लिए दायर की गई जनहित याचिकाओं की सुनवाई नई बेंच से कराने पर याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कड़ी आपत्ति की.

मामले को जस्टिस प्रदीप कान्त के बजाय जस्टिस मतीन की बेंच के सामने पेश किए जाने पर आपत्ति के बाद कोर्ट ने सुनवाई 18 नवंबर के लिए स्थगित कर दी.

रजिस्ट्रार को आदेश दिए गए हैं कि नई बेंच बनाने के संबंध में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एफ आई रिबेलो के परिपत्र अगली तारीख पर अदालत में पेश किए जाएँ.

याचिकाकर्ताओं के वकीलों का कहना था कि चूँकि जस्टिस प्रदीप कान्त की बेंच मामले की सुनवाई पहले से ही कर रही थी, इसलिए मामले सुनवाई वही बेंच करे.

क्रिमिनल पीआईएल

दूसरी ओर मायावती के वकीलों ने चीफ जस्टिस के उन आदेशों का हवाला दिया जिसके अनुसार क्रिमिनल पीआईएल के मामलों की सुनवाई के लिए जस्टिस मतीन की अध्यक्षता में नई बेंच को नियुक्त किया गया है.

ग़ौरतलब है कि लोक सेवकों पर भ्रष्टाचार के मुकदमों की मंजूरी को क्रिमिनल पीआईएल के तौर पर परिभाषित किया गया है.

दोनों तरफ की बहस सुनने के बाद अदालत ने रजिस्ट्रार को आदेश दिया कि नई बेंच बनाने के संबंध में चीफ जस्टिस के दोनों आदेश अगली तारीख में पेश किए जाएँ.

इस आदेश से इस पूरे मामले के दिलचस्प मोड़ आ गया है.

यह जनहित याचिकाएं तत्कालीन गवर्नर टीवी राजेश्वर के उस आदेश के खिलाफ दायर कि गयी हैं, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री मायावती और उनके घनिष्ठ सहयोगी नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था.

सीबीआई जांच के आदेश

याद दिला दें कि सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2003 में ताज कोरिडोर घोटाले का स्वयं संज्ञान लेते हुए सीबीआई जांच का आदेश दिया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सात अक्टूबर को रपट दर्ज करने और फिर नवंबर 2006 में ट्रायल कोर्ट में चार्ज शीट दाखिल करने का आदेश दिया था.

लेकिन ट्रायल कोर्ट ने सीबीआई से कहा कि चूँकि ये दोनों अभियुक्त लोक सेवक हैं इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए उनके नियुक्ति अधिकारी यानि गवर्नर की अनुमति दाखिल की जाए.

उस समय राष्ट्रपति चुनाव को लेकर मुख्यमंत्री मायावती और केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में तालमेल चल रहा था. माना जाता है कि इसीलिए तत्कालीन गवर्नर ने सीबीआई को मायावती के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी.

गवर्नर के इस आदेश के खिलाफ कमलेश वर्मा, मोहम्मद कतील अहमद और अनुपमा सिंह की ओर से तीन अलग अलग याचिकाएं दाखिल की गयीं.

तर्क दिया गया कि लोक सेवकों पर आपराधिक मुक़दमे चलाने से पहले अनुमति लेने का कानून इसलिए है, ताकि लोक सेवक अपना सरकारी काम निडर होकर करें.

मायावती को झटका

लेकिन चूँकि रिश्वत लेना या भ्रष्टाचार लोक सेवक का सरकारी कार्य नहीं है, इसलिए इस मामले में लोक सेवक को कानून का संरक्षण नहीं है. इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट के कई आदेशों का हवाला भी दिया जाता है.

जस्टिस प्रदीप कान्त की बेंच ने पिछले साल सितम्बर में जनहित याचिकाएं सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए नोटिस जारी किए थे. इससे मुख्यमंत्री मायावती को तगड़ा झटका लगा.

इसके बाद एक याचिकाकर्ता अनुपमा सिंह ने अदालत में दरखास्त दी कि सरकार के लोग उन पर याचिका वापस लेने का दबाव डाल रहे हैं. आरोप है कि एक निजी स्कूल के मालिक पर दबाव डालकर अनुपमा सिंह को नौकरी से बर्खास्त दिया गया. उनके पति दवा का बिजनेस करते हैं और उन पर सरकार के ड्रग इंस्पेक्टर से दबाव डलवाया गया.

जस्टिस प्रदीप कान्त ने अपने आदेश में इन तथ्यों का हवाला देते हुए दबाव में याचिका वापस लेने की अर्जी नामंजूर कर दी. इससे मुख्यमंत्री की परेशानी और बढ़ गयी.

नयी बेंच

इसी बीच मामले में एक और मोड़ तब आया जब नए चीफ जस्टिस एफ आई रिबेलो ने 28 अगस्त को एक प्रशासनिक परिपत्र जारी करके कहा कि अब सिविल और क्रिमिनल पीआईएल अलग अलग बेंच द्वारा सुनी जायेंगी. सिविल जन हित याचिका जस्टिस प्रदीप कान्त के पास ही रहेंगी, जबकि क्रिमिनल पीआईएल के लिए जस्टिस मतीन की अध्यक्षता में नयी बेंच बना दी गयी.

चीफ जस्टिस ने तीन दिन बाद 31 अगस्त को फिर एक स्पष्टीकरण जारी करके कहा कि भ्रष्टाचार के लिए मुकदमा चलाने की अनुमति संबंधी जनहित याचिका क्रिमिनल श्रेणी में रखी जायेंगी.

ख़बरें छपीं कि मायावती के खिलाफ याचिका जस्टिस प्रदीप कान्त की बेंच से हटा ली गयी है, तब हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार ने सफाई दी कि जनहित याचिकाओं की भारी संख्या को देखते हुए यह आदेश किया गया है. यह भी कहा गया कि ये याचिका जस्टिस प्रदीप कान्त की बेंच में ही सुनी जाएँगी.

दबाव

न्यायिक उत्तरदायित्व और सुधारों के लिए कार्यरत संस्था की ओर से सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने इस सम्बन्ध में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस कपाड़िया को एक शिकायत की.

प्रशांत भूषण ने अपनी शिकायत में कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने मुख्यमंत्री मायावती से मिलने के बाद उनके दबाव पर बेंच बदलने का यह आदेश जारी किया है. शिकायत में इसे एक गंभीर दुराचरण बताते हुए जांच की मांग की गयी.

इस पृष्ठभूमि में इस बात का इंतज़ार किया जा रहा था कि ये याचिकाएं किस बेंच के समक्ष सुनी जायेंगी.

नया मोड़

रजिस्ट्रार ने मायावती के खिलाफ जनहित याचिकाएं बुधवार को पुरानी बेंच के बजाय नई बेंच के सामने लगा दीं तो लोगों की दिलचस्पी और बढ़ गयी. लेकिन वकीलों ने नई बेंच के सामने चीफ जस्टिस के आदेश पर औचित्य का सवाल उठा दिया, जिससे मामले अब और उलझ गया है.

एक दिलचस्प बात यह भी हुई कि जिस अनुपमा सिंह ने अपनी याचिका वापस लेने की अर्जी दी थी, उन्होंने अब एक नया वकील करके फिर से केस की पैरवी शुरू कर दी है.

अब अदालत को अगली तारीख पर मूल मामला सुनने से पहले बेंच के बंटवारे पर आपत्तियों का निस्तारण करना होगा.

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