विकास के अलावा भी हैं मुद्दे

बिहार
Image caption सड़कें तो ठीक लेकिन लोगों को भ्रष्टाचार से श़िकायत है.

पटना जिले की दस विधानसभा सीटों के लिए एक नवंबर को मतदान होना है.

मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए उम्मीदवार प्रचार में कोई कसर बाक़ी नहीं रख रहे. कहीं गाड़ियों में लाउड स्पीकर लगा कर प्रचार हो रहा है. तो कहीं प्रत्याशी लोगों के बीच जाकर उनसे वोट मांग रहे हैं.

चुनाव प्रचार की इसी सरगर्मी के बीच पटना से जब मैं फतुहा की ओर बढ़ा तो चमचमाती सड़क और उसके दोनों ओर लहलहाती फसलों को देखकर ऐसा लगा नए बिहार में आ गया हूं.

लोग भी खुशहाल नज़र आए. लगा नीतीश कुमार का विकास का नारा चल पड़ा है और उसके रंग भी दिखने लगे हैं.

नाराज़गी

Image caption लोग विकास से तो ख़ुश हैं लेकिन शराब की दुकानों को लाइसेंस दिए जाने से नाराज़ हैं.

लेकिन जैसे ही मैं फतुहा पहुंचा और वहां के लोगों से बात की तो राजनीति की एक अलग सच्चाई सामने आई.

लोग मौजूदा जेडीयू विधायक अजय सिंह से खासे नाराज़ नज़र आए.

उनका कहना था कि पांच साल में उनके विधायक उनकी सुध लेने कभी नहीं आए.

लोगों की नाराज़गी नीतीश सरकार से भी थी. उनका कहना था कि एनडीए के पांच साल के शासन में भ्रष्टाचार बढ़ा है. शिक्षा और रोज़गार की दिशा में कुछ भी काम नहीं हुआ है.

जगह-जगह शऱाब की दुकानों को लाइसेंस दिए जाने से भी लोग ख़ासे नाराज़ नज़र आए.

आम लोगों की राय थी कि विकास की बात तो ठीक है लेकिन विकास ज़मीन पर या फिर आम लोगों की ज़िंदगी में जैसा नज़र आना चाहिए वैसा नज़र नहीं आ रहा.

अलग तस्वीर

बहरहाल फतुहा से जब मैं आगे बख्ति़यारपुर और बाढ़ की ओर बढ़ा तो सड़क की चमचमाहट बरक़रार थी और गाड़ियां फर्राटे से दौड़ रही थीं.

नीतीश कुमार के विकास का नारा स्थानीय विधायक की वजह से फतुहा में भले ही काम नहीं कर रहा था लेकिन बाढ़ विधानसभा क्षेत्र की जनता जनता दल यूनाइटेड के विधायक ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू के काम से संतुष्ट नज़र आई.

लेकिन बेगूसराय से सटे पटना के सीमावर्ती मोकामा क्षेत्र में जहां बाढ़ की समस्या आम रहती है वहां के लोग जदयू के मौजूदा बाहुबलि विधायक अनंत सिंह से से ख़ुश नज़र नहीं आए.

वहां जिन लोगों से मेरी बात हुई उनमें अधिकतर लोग लोक जनशक्ति पार्टी की उम्मीदवार सोनम देवी को इसीलिए वोट देना चाहते हैं कि पाँच साल में अनंत सिंह कहीं नज़र ही नहीं आए.

लोगों का कहना था इस दौरान उनका बाहुबल और आतंक ही हावी रहा और फ़ायदा केवल उन्हें ही हुआ जो विधायक के दरबार में हाज़िरी लगाते रहे.

बहरहाल पटना की हर विधानसभा सीट की कहानी अलग-अलग है.

Image caption पटना की हर विधानसभा सीट की कहानी अलग है.

कहीं नीतीश कुमार के विकास का नारा बुलंद है तो कहीं स्थानीय मुद्दे और एनडीए विधायक से नाराज़गी ज्यादा अहम हैं.

लेकिन बिहार के चुनावी समर का सच सड़क के किनारे बैठे कुछ लोगों से बात कर जान पाना आसान नहीं है.

मैंने जितनी भी महिलाओं से बात करने की कोशिश की उनमें से ज़्यादातर को नहीं मालूम कि वोट किसे देना है. उनके वोट का फ़ैसला शायद उनके घर के मालिक मुख्तार करेंगे. जहां कहेंगे उसी चुनाव चिन्ह का बटन वो दबा आएंगी.

जाति का प्रश्न इन इलाक़ों में ऊपर से तो दबा हुआ नज़र आता है लेकिन भीतर ही भीतर वो क्या समीकरण बना रहा है ये बता पाना आसान नहीं.

शायद इसका जवाब लालू यादव और रामविलास पासवान के चेहरे पर चमक रहे आत्मविश्वास में छिपा हो सकता है जिसका पता चुनाव के बाद ही चल पाएगा.

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